इस पथ का उद्देश्य नहीं है, शान्त भवन में टिके रहनाकिन्तु पहुँचना उस मंजिल पर जिसके आगे राह नहीं ॥

समूची धरती जल रही है, धरती की इस तपन को सम्पूर्ण विश्व महसूस कर रहा है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। खतरा एक-दो को नहीं बल्कि समूची मानव जाति को है इसलिए जरूरत है ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से उपज संकट से धरती को बचाने की। जब धरती के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग गये हों, तब इसमें मीडिया की भूमिका और बढ़ जाती है। यह मीडिया ही तो है, जो किसी भी क्रान्ति को जन्म दे सकता है, बस जरूरत है तो इसके साथ सभी के कदमताल मिलाने की।
वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग ) से उठे धरती पर संकट आज यूं तो पूरा विश्व जता रहा है। विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष इससे बचाव हेतु डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में मिल भी चुके हैं, लम्बी वार्ताएं भी हुई। लेकिन इससे निजात के रूप में कोई ठोस हल नहीं निकाला जा सका है। भारत में हर साल करीब 3,50,000 टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट जमा हो जाता है और करीब 50,000 टन इंपोर्ट होता है। ई-वेस्ट का आयात गैरकानूनी है, इसलिए यह स्क्रैप, सेकंड हैंड इलेक्ट्रिकल एपलायंसेज एवं अन्य चीजों के रूप में भारत में आता है। यह सारा ई-वेस्ट हमारे देश में एकत्र हो जाता है। देश के अनियोजित क्षेत्र द्वारा इस ई-वेस्ट का 90 प्रतिशत हिस्सा रीसाइकल कर दिया जाता है, लेकिन अनियोजित तरीके से रीसाइकल करना कापफ़ी नुकसानदायक है। भारत में वर्ष 2007 में लगभग 3,30,000 टन ई-वेस्ट एकत्र हुआ था।
इधर मीडिया इन खबरों को प्रसारित कर इतिश्री समझ लेता है, जबकि वह स्वयं ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के प्रति लोगों को जागरूक करने में बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। हालांकि जी न्यूज के ‘माई अर्थ, माई ड्यूटी’ को कापफ़ी सराहा गया।
इस तरह के अभियान चलाने में देश-दुनिया के लोग कापफ़ी कंजूसी बरतते हैं। भले ही उनके लिए वायुमंडल का तापमान कितना ही शर्मा जाए। क्या लोग नहीं जानते कि उनके घरों, दफ्रतरों सहित गाड़ियों में लगे एयरकंडीशन अंदर तो ठंडा करते हैं, किन्तु बाहरी वातावरण को तपन से भर देते हैं। ऐसे लोगों को यह जानना होगा कि जाने-अनजाने में वे वातावरण का तापमान तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन इसे सुधारने अथवा क्षतिपूर्ति की एवज में क्या रहे हैं।
वातावरण की गर्मीं बढ़ाने में सहायक लोगों को जागरूक करने के लिए देशभर में चेतना यात्र-5 के जरिए लोगों को ‘वृक्षारोपण’ के लिए चेताया गया। इस बार ‘चेतना यात्र-6’ व ‘ग्रीन ब्रॉडकास्टिंग’ के बैनर तले ब्रॉडकास्टर्स से लेकर लास्टमाइल ऑपरेटरों उपभोक्ताओं को ग्लोबल वार्मिंग ई-वेस्ट कचरा निदान के प्रति जागरूक किया जाएगा। निसंदेह इसका प्रभाव करोड़ाें लोगों पर पड़ेगा। लोगों को नवीनीकृत ऊर्जा के इस्तेमाल के प्रति जागरूक किया जाएगा। उन्हें ‘चेतना यात्र-6’ के अंतर्गत बताया जाएगा कि वे पेड़-पौधे लगाकर, पेड़-पौधे गोद लेकर विश्व के बढ़ते तापमान में कमी ला सकते हैं।
इसमें कोई शक-सुबह नहीं कि जब इस तरह का कैंपेन विभिन्न टीवी चैनलों के जरिए दर्शकों/ उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा, तो वे सभी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। कहते हैं स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन बसता है, किन्तु शरीर तभी स्वस्थ रहेगा, जब हमें स्वस्थ वायु मिलेगी, स्वस्थ ऊर्जा मिलेगी। स्वस्थ ऊर्जा, स्वस्थ वायु के लिए जरूरी है कि धरती का तापमान संतुलित हो। ग्लोबल वार्मिंग में कमी आए। यह सब तभी संभव है, जब हम सभी इसके प्रति जागरूक हों। केन्द्र सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए योजनाएं तो बनाती है, उसके लिए पफ़ंड भी घोषित करती है लेकिन ऐसी योजनाएं, ऐसे पफ़ंड मूर्त रूप लेने से पहले ही ‘ठिकाने’ लगा दिए जाते हैं। लेकिन ठीक पहल तो होनी ही चाहिए।
समूची कम्यूनिटी को इसके प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी उठाई है डा-ए- के- रस्तोगी ने। इस बार वे चेतना यात्र-6 के माध्यम से एक बार पिफ़र लोगों के बीच पहुंच उन्हें ई-वेस्ट कचरा निदान, ग्लोबल वार्मिंग आदि के प्रति सचेत करेंगे। 5 सितम्बर 2010 से शुरू होने वाली ‘चेतना-यात्र-6’ दिल्ली से आरम्भ होकर हरियाणा-पंजाब के रास्ते देश के 300 से भी अधिक शहरों से होकर गुजरेगी। 25 हजार किलोमीटर का सपफ़र तय करने वाली एवं 55 दिनों तक चलने वाली इस यात्र में 100 से अधिक मीटिंगें की जाएंगी।

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