एक और चेतना यात्रा; लगातार नौ यात्राओं के बाद,सितम्बर-अक्टूबर-2014

जुनून के बिना ऐसा कुछ कर पाना सम्भव ही नहीं होता है, लेकिन यह जुनून आखिर है क्या\ इसका जवाब तभी समझ में आ सकता है जब इस विशेष कम्युनिटी का सच समझ में आ जाए। विशेष कम्युनिटी अर्थात जिसमें स्वंय में शामिल हँू, ‘ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टी-वी- कम्युनिटी’ जिसकी पहुँच देश के कौने-कौने तक है। इसे देश का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है, जिसके अलग-अलग रूप है। लेकिन मुख्यः एक कन्टेट्स प्रोवाईडर (ब्रॉडकास्टर) दूसरा हैडेण्ड सर्विस प्रोवाईडर (एम-एस-ओ-) तीसरा केबल टी-वी- सर्विस प्रोवाईडर (केबल टी-वी- आपरेटर) एंव चौथा उपभोक्ता (दर्शक) है। यह एक ऐसी कम्युनिटी है कि इनके तार जब जुड़ जाते हैं तब इनके सामने सारी ताकते बौनी हो जाती है। अन्ना आन्दोलन का प्रमाण सबने देखा है। ऐसी कम्युनिटी का हिस्सा होना बड़े गर्व की बात है और मैं स्वंय को केबल टी-वी- आपरेटर के रूप में इस कम्युनिटी की नींव का एक मजबूत पत्थर मानता हूं।

पूर्व में केबल टी-वी- ऑपरेटर ही हैडेण्ड सर्विस प्रोवाईडर भी हुआ करते थे। किसी भी चैनल के लिए दशर्कों तक पहुँचना तभी सम्भव होता था, जब केबल टी-वी- ऑपरेटर उस चैनल को दशर्कों तक पहुँचाए। ऑपरेटरों ने ही इन चैनलों को हर गली मुहल्ले में अपनी केबल बिछा कर दशर्को तक पहुँचाया। दशर्कों के साथ चौबीसों घण्टों सीधा-सीधा जुड़े रहने वाला विशिष्ट व्यक्तित्व है केबल टी-वी- ऑपरेटर कौन सा चैनल कहां से आता है दशर्को का इससे कोई वास्ता नहीं होता है। दशर्को की मांग अपने केबल टी-वी- आपरेटर तक ही होती है। जबकि केबल टी-वी- ऑपरेटर इन चैनलों को किस तरह अपने दशर्को तक पहुंचाते है, इस का कोई वास्ता नहीं होता है। इस मामले में ब्रॉडकास्टर भी अपने को ऑपरेटर से बिल्कुल अलग रखते है, क्योंकि शुरूआत तो उन्होने मुफ्रत में चैनल परोस कर कर ली लेकिन दशर्को को चस्का लगवा देने के बाद ऑपरेटरों से चैनलों का पैसा भी वसूलना शुरू कर दिया।

पे चैनलों के प्रचलन में आ जाने से एम-एस-ओ- प्रचलन में आ गए और केबल टी-वी- ऑपरेटरों को सिर्फ केबल टी-वी- सर्विस प्रोवाईडर तक ही सिमट जाना पड़ा, जबकि वह स्वंय हैडेण्ड आनर हुआ करते थे। उपभोक्ताओं को इस बात का पता भी नहीं चला कि उनका केबल टी-वी- ऑपरेटर अब असहाय हो चुका है। वह स्वंय किसी एम-एस-ओ- से सिग्नल प्राप्त कर अपने दर्शको तक पहुंचा रहा है। अब अपने दर्शको की पसन्द के अनुसार वह चैनल उपलब्ध नहीं करवा सकता है। बल्कि जो एम-एस-ओ- द्वारा मिल रहा है, उसे ही दर्शको तक पहुंचा सकता है।


एम-एस-ओ- द्वारा किए गए विस्तार के कारण किसी भी चैनल के लिए एम-एस-ओ- को खुश करना मजबूरी बन गया, वहीं से कैरिज फीस की शुरूआत हुई। अर्थात चैनल अब मुफ्रत में दर्शको तक नहीं पहुंचेगा उसके लिए अब जेबे हल्की करनी होगी ब्रॉडकास्टर को। केरिज फीस की आमदनी पे चैनलों को दिए जाने वाले भुगतान से भी आगे निकल गई, इसीलिए ग्राऊण्ड से पैसा जितना उठाया जाना था नहीं उठाया गया। ऑपरेटरों से उगाही की जगह विस्तार करवाया गया, भले ही पड़ोसी ऑपरेटरों के साथ कम्पिटीशन कर केबल टी-वी- दरें 250 रूपये तक ही क्यों ना पहुंच गई लेकिन एम-एस-ओं- ने ग्राऊण्ड को सुधारने की कभी कोई कोशिश नहीं की। इसकी उसे जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि उसकी पूर्ति तो कैरिज फीस से ही होने लगी थी। बड़ी धूर्तता के साथ पे चैनल ब्रॉडकास्टर्स और एम-एस-ओ- ने मिलकर पहले तो केबल टी-वी- ऑपरेटरों के हैडेण्ड बन्द करवा दिए, लेकिन ऑपरेटर अपनी ताकत आपसी कम्पिटीशन में ही गंवाते रहे। पे चैनलों के बढ़ते जा रहे आर्थिक बोझ से बचने के लिए एम-एस-ओ- के प्रयासों को सफलता मिली और कण्डीश्नल एक्सेस सिस्टम (ब्।ै) कानून भी बनवा लिया गया, लेकिन वह कानून लागू नहीं करवाया जा सका।

केबल टी-वी- का वर्चस्व तोड़ने के लिए डायरेक्ट टू होम (क्ज्भ्) के प्रचलन में आ जाने से एम-एस-ओ- के भी पर कुतरने का काम ब्रॉडकास्टर्स ने किया। क्योंकि अब तक एम-एस-ओ- किसी भी चैनल का प्रसारण बन्द कर ब्रॉडकास्टर पर दबाब बनाने की कोशिश कर लिया करता था, लेकिन उनकें प्रचलन में आ जाने के बाद किसी चैनल को बन्द करने से पहले कई बार सोचना पड़ता था। इण्डष्ट्री की इन्हीं उठापटक में केबल टी-वी- ऑपरेटर पीछे बहुत धकेले जाने लगे, जबकि इसका कोई महत्व ही नहीं है। केबल टी-वी- ऑपरेटर अपनी वास्तविक पहचान खोते जा रहे थे, जिन्हें भविष्य में ढूंढ पाना बहुत कठिन हो जाएगा, जबकि वह आज भी उपभोक्ताओं के साथ जुड़े हुए है।

एम-एस-ओ- से सिग्नल प्राप्त कर अपने उपभोक्ताओं के टी-वी- तक उपलब्ध करवाना और उपभोक्ताओं से उगाही कर एम-एस-ओ- तक पहुंचाने का काम केबल टी-वी- ऑपरेटर ही कर रहे है। ऑपरेटरों के साथ उसके उपभोक्ताओं का रिलेशन बेजोड़ है, पच्चीस सालों का जिसे कजी या फिर एम-एस-ओ- भी तोड़ नहीं सके है। लेकिन हालात बहुत जटिल होते जा रहे थे। केबल टी-वी- ऑपरेटरों को जागरूक करना बहुत जरूरी था, अतः तब सन् 2000 में पाक्षिक ‘आविष्कार दर्पण’ समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया गया, जिससे कि उनके साथ सदैव जुड़ा रहा जा सके। समाचार पत्र को सीधे- सीधे ऑपरेटरों तक पहुँचा पाना सरल नहीं था, अतः प्रयास किया गया कि भिन्न शहरों और कस्बों में हैडेण्ड सर्विस देने वाले अपने केबल टी-वी- ऑपरेटरों तक ‘आविष्कार दर्पण’ पहुंचाएँ।

लेकिन कोई नहीं चाहता था कि ऑपरेटरों में जागरूकता आए या उसे कोई जानकारी प्राप्त हो अथवा वह अन्य ऑपरेटरों के साथ जुड़े। ऑपरेटरों को जगाने और जोड़ने के लिए तब केवल एक मात्र रास्ता यही बचा था कि किसी ना किसी तरह से सीधे-सीधे उनके पास पहुँचा जाए। वहीं से ‘चेतना यात्र’ का जन्म हुआ। 2005 में देश की पहली चेतना यात्र की गई, लेकिन इस यात्र में केबल टी-वी- ऑपरेटरों से मिल पाना भी अब कितनी टेढ़ी खीर हो गया है का बोघ हुआ। ऑपरेटरों से मिलने के लिए आखिर कोई कैसे उन तक पहुँच सकता था, क्योंकि उसका ठिकाना अब एम-एस-ओ- तक ही सीमित हो गया था। अतः कई एम-एस-ओ- ने हमें सहयोंग देते हुए ऑपरेटरों तक हमारा सन्देश भी भेजा कि आपसे मिलने के लिए दिल्ली से एक ऑपरेटर अपनी गाड़ी में ‘चेतना यात्र’ पर निकला हुआ है। कई शहरों में कुछ ऑपरेटर बड़े कोतुहल के साथ मिले भी, लेकिन या तो वह एम-एस-ओ- के डमी निकले या फिर वह यही सोचने में लग गए कि आखिर उन्हें जगाने- जोड़ने में इसका हित क्या है\ कोई क्यों किसी के हित के लिए अपना घर बार छोड़ कर निकलेगा—–आदि।

पहली चेतना यात्र बहुत कठिन लेकिन कडवे- मीठे अनुभवों से भरी थी। उसने नई सम्भावनाओं का मार्ग प्रशस्त किया, उम्मीदों को जगाया लेकिन निराशा को नजदीक भी नहीं भटकने दिया। इस तरह 2005 में आरम्भ की गई ‘चेतना यात्र’ का दसवां भाग अब सितम्बर- अक्टूबर 2014 में होगा। लगातार हर वर्ष सितम्बर- अक्टूबर में की जाने वाली चेतना यात्र में देश के कौने-कौने में बैठे केबल टी-वी- ऑपरेटरों का विश्वास जीतना ही अपने आप में बहुत कठिन कार्य था, लेकिन विश्वास के साथ-साथ सम्मान भी प्राप्त किया गया। देश की महाशक्ति के रूप में वह हरेक शहर कस्बे गांव में अपनी विशेष पहचान के साथ मौजूद है। मीडिया के अंश के रूप में वह आज भी हर चोखट के सजग प्रहरी है। कण्डीश्नल एकसेस सिस्टम(ब्।ै) कानून रद्द कर नया कानून क्।ै (डिजीटल एड्रेसिबल सिस्टम) लाया गया है।

एनॉलाग को पूर्णतया खत्म कर देशभर में डिजीटाइजेशन लागू किए जाने की प्रक्रिया अब द्वितीय चरण में पूर्णता की ओर बढ़ रही है। शीघ्र ही डैस का थर्ड फेस भी लागू होने वाला है, जिसके अर्न्तगत देश का अधिकांश हिस्सा आ जाएगा, लेकिन केबल टी-वी- ऑपरेटर का भविष्य इस व्यवसाय में कितना सुरक्षित रह पाएगा\ यह सवाल आज बहुत बड़ा बन गया है। सवाल सिर्फ केबल टी-वी- ऑपरेटरों के भविष्य तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब सवाल पूरी इण्डष्ट्री के ढ़ँाचे पर ही खड़े हो गए है। यू तो सबने मिलकर ब्।ै की जगह क्।ै का कानून बनवाया था, लेकिन सरकारी शिकंजा कुछ इस कदर कसता जा रहा है कि हर पक्ष छट-पटाने लगा है। डी-टी-एच- ऑपरेटर हो या फिर ब्रॉडकास्टर दोनो दुःखी है और रो रहे हैं जबकि एम-एस-ओ- अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है और केबल टी-वी- आपरेटर बिल्कुल ही बेचारा होकर रह गया। वह देश भर में तूफान उठाए हुए है। उपभोक्ता कह रहा है कि उसे लूटा जा रहा है, क्योंकि पहले उसे सैट्टॉप बॉक्स थमाए फिर हरेक टी-वी- से अलग-अलग वसूली और कभी सैट्टाप बॉक्स के नखरे तो कभी रिमोट कन्ट्रोल खराब होने से होने वाली परेशानियाँ और बढ़ गई हैै। काम बढ़ा दिया गया है और उपभोक्ताओं की आज़ादी छीन ली गई है।


इण्डष्ट्री के बिगड़ते हालातों के बीच ऑपरेटरों के आस्तित्व पर तो प्रश्न चिह्न लग ही रहे है, जबकि उम्मीदे वैल्यु एडेड सर्विसेस की भी थी। ऐसे में किस दिशा की और बढ़े ऑपरेटर यह तो उन्हें ही तय करना होगा, लेकिन उपभोक्ता भले ही ैज्ठ के कारण एम-एस-ओ- के नियन्त्रण में चले गए हो, फिर भी उनके साथ ऑपरेटरों का रिलेशन सदैव बना रहना चाहिए। यह बहुत जरूरी है लेकिन अब सरल नहीं रह गया है, अतः एक और यात्र आपरेटरों को जगाने व जोड़ने के साथ-साथ वैल्यु एडेड सर्विसेस उपभोक्ताओ तक पहुँचाने के लिए, यात्र हमेशा की तरह इस वर्ष भी सितम्बर-आक्टूबर में होगी और रूट वही जो पिछले साल का था, लेकिन तारीखों में अवश्य थोड़ा बदलाव होगा। अतः आपरेटर रूटानुसार अपनी तैयारी करें, शीघ्र ही यात्र उनके बीच पहुंचेगी।

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