चेतना यात्रा-7 दिल्ली से नैनीताल (हरियाणा-पंजाब-जम्मू-कश्मीर-हिमाचल-चण्डीगढ़-उत्तराखण्ड)

भारतीय ब्रॉडकास्टिंग एण्ड केबल टीवी इंडष्ट्री की समस्त कड़ियों को एक सूत्र में पिरोने एवं भावी सम्भावनाओं की तमाम जानकारियां उन तक पहुंचाने के लिए बीते छः वर्षाें से लगातार प्रत्येक वर्ष की जा रही चेतना यात्र की सातवीं यात्र 3 सितम्बर को देश की राजधानी दिल्ली से आरम्भ हुई। यात्र की शुरूआत के लिए दिल्ली में कोई आडम्बर ना करके सीधे-सीधे यात्र को बड़ी सादगी के साथ शुरू किया गया। घर-परिवार-समाज से भावभीनी विदाई लेकर यात्र बहादुरगढ़ होते हुए रोहतक पहुंची, जहां सिटी केबल संचालकों ने भारी स्वागत सत्कार किया। यहीं पर जिंद से भी ऑपरेटर पधारे हुए थे, क्योंकि यात्र के रूट में इस बार जिंद का दौरा नहीं था।


जिंद से हरफूल सिंह एवं रोहतक से नरेश जैन आदि के साथ इंडष्ट्री के भविष्य पर लम्बी चर्चा कर यात्र हांसी होते हुए हिसार पहुंची। सिटी केबल के आपिफ़स में ही आपरेटरों के साथ बैठक हुई, जिसमें विशेष तौर पर डिजीटल को लेकर आशकाओं का निवारण किया गया। हिसार में ही पाले राम जी के साथ भी इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर लम्बी चर्चा के बाद यात्र भिवानी पहुंची, जहां राजकुमार-प्रदीप चौहान आदि ने गर्मजोशी के साथ यात्र का स्वागत किया। चेतना यात्र-7 का यह पहला पड़ाव भी बना। भिवानी में रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह वृक्षारोपण कर यात्र सिरसा-भण्डीडब वाली के रास्ते पंजाब में दाखिल हुई। अगली यात्र का दूसरा पड़ाव पंजाब में भटिण्डा बना। शेरे पंजाब के रूप में, सन्नी गिल सहित पफ़ास्ट वे के भटिण्डा आपिफ़स में यात्र का का भव्य स्वागत किया एवं पंजाब में डिजीटल पर विस्तार से चर्चा की गई।

भटिण्डा में ही आमन्त्रण से बाबी 8 टीम के द्वारा भी यात्र का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। भटिण्डा पड़ाव की अगली सुबह आमन्त्रण के द्वारा आयोजित वृक्षारोपण कार्यक्रम के बाद यात्र लुधियाना पहुंची, जहां फास्ट वे प्रमुख गुरदीप सिंह जी के साथ डिजीटिलाईजेशन एवं इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर लम्बी चर्चा हुई। गुरदीप सिंह ने बताया कि केबल टीवी इंडष्ट्री को खतरा डी-टी-एच से है, पंजाब इसके लिए पूरी तरह से तैयार है। पफ़ास्ट वे पूरी तरह से डिजीटिलाईजेशन पर काम कर रहा है, जिसके बेहतर परिणाम भी आने लगे हैं। पंजाब के साथ-साथ पफ़ास्ट वे के साथ अब हरियाणा व हिमाचल भी जुड़ गए हैं। पफ़ास्ट वे की सर्विसेस डी-टी-एच से कापफ़ी बेहतर भी हैं इसीलिए उपभोक्तागण डी-टी-एच को टाटा-बाय-बाय कर पफ़ास्ट वे की सर्विसेस लेना ज्यादा पसंद करते हैं। केबल टीवी पर लोगों को शिक्षित करने के लिए भी पफ़ास्ट वे काम कर रहा है एवं अन्य एम-एस-ओ- को भी कम्प्टीटर नहीं बल्कि सहभागी के रूप में साथ-साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है।


पफ़ास्ट वे के प्रांगण में वृक्षारोपण कर यात्र सीधे जालन्धर पहुंची। जालन्धर में ही गाड़ी की पहली सर्विस 1000 किमी पर भी करवाई, क्योंकि चेतना यात्र-7 के लिए ली गई नई गाड़ी इन्नोवा क्रिस्टा 30 अगस्त को ही ली गई थी। जिसकी पहली सर्विस 1000 कि-मी- पर होनी थी। जालंधर में ही यात्र का तीसरा पड़ाव हुआ। मालूम हुआ कि दिल्ली हाईकोर्ट में बम ब्लास्ट हुआ, जिसमें कापफ़ी लोग मारे गए एवं घायलों की संख्या भी बहुत ज्यादा रही। ना जाने कितने लोग ऐसे हादसों की भेंट चढ़ चुके हैं, लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृति ना हो उसका कोई भी बन्दोबस्त देश पर राज करने वाले नहीं कर सके हैं। दिल्ली बम ब्लास्ट से देशभर के नागरिक आहत हैं।

बहरहाल टीवी चैनलों पर टीआरपी बटोर रही अन्ना खबरों का दिल्ली ब्लास्ट ने पूरी तरह से पीछे धकेल दिया। है। जालंधर में आपरेटरों के साथ विचार गोष्ठी कर यात्र अमृतसर पहुंची, जहां गुरिन्दर सिंह बब्बी भाई सिटी-पफ़ास्ट वे, दोनों का दायित्व सम्भाले हुए हैं। अमृतसर से बाघा बार्डर पर भारत-पाकिस्तान की ध्वज ड्रिल के गवाह बनने के बाद सीधे पठानकोट पंहुची यात्र। पठानकोट से सीधे जम्मू पहुंचकर वृक्षारोपण कार्यक्रम एवं डिजीटल पर विस्तृत चर्चा के बाद यात्र ऊधमपुर होते हुए पटनी टाप पहुंची, वहीं रात्रि विश्राम के बाद आगे की बहुत ही कठिन यात्र के लिए रवाना हो गई यात्र।
पटनीटाप से आगे के रास्ते की कठिनाईयां एक नहीं बल्कि अनेक थीं। जैसे कि यही नहीं कन्पफ़र्म हो पा रहा था कि आगे के मार्ग से हम ओग भी कहीं पहुंच पाएंगे या इतनी लम्बी यात्र करके भी आगे जाने के लिए लिए इसी रास्ते से वापिस जम्मू होकर पठानकोट से ही हिमाचल जाना होगा\

सपफ़र पर आगे बढ़ते हुए सबसे बड़ी दिक्कत हमेें इसी बात को लेकर चिन्ता हो रही थी कि इतनी दूर खतरनाक दुर्गम पहाड़ी रास्ते का सफर करने के बाद भी यदि इसी रास्ते से वापिस आना पड़ गया तब यात्र की परेशानी के साथ-साथ हमारा समय भी बहुत ज्यादा व्यर्थ हो जाएगा। कापफ़ी कोशिश के बावजूद भी कहीं से भी यह कन्पफ़र्म नहीं हो पाया कि जिस मार्ग से यात्र आगे बढ़ रही है वह रास्ता हिमाचल भी पहुंचा सकेगा या नहीं। रूकने या पिफ़र वापिस मुड़ने से यही बेहतर था कि उस पर आगे बढ़ते रहो, यात्र आगे बढ़ती हुई डोडा-बटोट-भदरबा तक पहुंच गई। भदरवा पहुंच जाने के बाद ही यह कन्पफ़र्म हो पाया कि एटलस में दिए गए रोड मैप के अनुसार जम्मू एण्ड कश्मीर से जो मार्ग भदरवा से चलकर हिमाचल में चम्बा तक पहुंचता है वह चालू ही नहीं है।

भदरवा से चम्बा का मार्ग बन्द होने के कारण एक ही रास्ता बचा था कि हम पठानकोट से जिस रास्ते से होते हुए यहां पहुंच हैं सीधे-सीधे उसी रास्ते से वापिस पठानकोट पहुंचे और वहीं से हिमाचल की ओर बढ़े। जम्मू एण्ड कश्मीर की खूबसूरत वादियों में देवदार-चीड़ टेढ़ी-मेढ़ी संकरी पहाड़ी रास्ता भी आसान नहीं था, लेकिन इतनी ऊपर पहुंच जाने के बाद भी खाली हाथ वापसी की सम्भावनाएँ ज्यादा थकाने लगी थीं कि उम्मीद की एक किरण दिखाई दी। भदरवा टैक्सी एण्ड पर एक ड्राइवर ने बताया कि इधर से एक रास्ता है तो जो आपको हिमाचल निकाल सकता है लेकिन सड़क कैसी होगी, नहीं मालूम, कहीं-कहीं बहुत ज्यादा खराब भी हो सकती है, लेकिन यह रास्ता हिमाचल तक पहुंचता जरूर है आप चाहे तो ट्राई कर सकते हैं। हमने दूसरे ड्राइवर एवं भदरवा के लोगों से भी उस रास्ते पर बाते कीं लेकिन कच्ची-पक्की ही जानकारी मिल सकी।

भदरवा के आपरेटर भी उस रास्ते पर निश्चित तौर से कुछ कहने से बचते ही नजर आए, जबकि इस रास्ते से हिमाचल में जहां निकला जा सकता था वहां के आपरेटर ने हमें पहले ही कह दिया था कि इधर के लिए सीधा रास्ता पठानकोट से ही आता है उधर से कोई नहीं आता है। तमाम निगेटिविटी के बावजूद भी हमने वापिस जाने की अपेक्षा आगे ही बढ़ने का निर्णय लिया, क्योंकि यह तो हमे कन्पफ़र्म हो गया था कि यहां से एक रास्ता हिमाचल को जोड़ता तो है लेकिन रास्ता कैसा होगा, कितना कठिन होगा उसका स्वाद केवल वही जान सकता है जो उसे पार करेगा। भदरवा से हिमाचल पहुंचने के लिए वापिस जम्मू-पठानकोट ना जाकर हमने वह बीहड़ मार्ग चुना जिसके बारे में वहां के स्थानीय लोग भी ज्यादा जानकारी नहीं दे पाते है। भदरवा से यह मार्ग बनी पहुंचाता है और बनी से िभसोली या पिफ़र हिमाचल में नूरपुर-शाहपुर होकर रानीखेत के रास्ते डलहौजी पहुंचा जा सकता हैं।

हमने इसी मार्ग से यात्र को आगे बढ़ाया। सड़क के नाम पर यह एक संकरा सा सुनसान-ब्यावान एैसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर बैलगाडियां और टैªक्टर तो आ जा सकते हैं लेकिन इन्नोवा गाड़ी नहीं। बडे़-बड़े पत्थरों के ऊपर से जब टेढी में दी कर इन्नोवा को आगे निकाला जाता था। जब नई-नई ली गई गाड़ी जो आवाज निकालती थी वह वहां से गुजरते हुए हमें सापफ़-सापफ़ महसूस होती थी। वापिसी के सारे मार्ग छोड़ कर हम आगे तो बढ़ते जा रहे थे, लेकिन रास्ते में कहीं-कहीं सीमा सुरक्षा बल की तैनाती एवं उनकी बख्तर बन्द गाडियों की मौजूदगी उस दुर्गम क्षेत्र की हकीकत बता देती थी। इस मार्ग पर दूर दराज ही कहीं कोई बंकर सा आधा जमीन के अन्दर और थोड़ा सा ऊपर निकला हुआ इंसानी डेरा दिखाई दे जाता था, नहीं तो दूर तलक किसी इन्सान की उपस्थिति का पता भी नहीं लगता था।

जंगल ही जंगल और उनके बीच से गुजरते। यह पहाड़ी पगडण्डी जिसमें जगह-जगह उपर से गिरते झरने और झरनों से बनते बड़े-बड़े नाले जिन्हें पार करना हर बार और कठिन होता जाता था। तभी सुरक्षा बलों की एक विशेष (गुप्त सी) चौकी सामने दिखाई दी। उनकी मुस्तैदी देखकर हमें भी आश्चर्य हुआ, लेकिन शीघ्र ही यह भी समझ में आ गया कि यह क्षेत्र मिलिटेंसी ग्रस्त है यहां आम नागरिकों की आवाज ही नहीं हुआ करती है, इसीलिए हमें वहां देखकर वह भी भौंचक्के रह गए। इस तरह से ऐसे मार्ग से आगे बढ़ने से उन्हाेंने हमे रोका तो नहीं लेकिन बता दिया कि रास्ता ठीक नहीं है, यह मार्ग हिमाचल भी पहुंचा सकता है। दूर तक सन्नाटा, धीरे-धीरे दिन की रोशनी भी अब धुंधलाने लगी थी और गाड़ी में डीजल भी कापफ़ी कम रह गया था, लेकिन आगे का रास्ता अभी कितना लम्बा है, नहीं मालूम था, पिफ़र भी हम चले जा रहे थे। चलते-चलते बनी भी पहुंच गए और बनी से नूरपुर-शाहपुर होते हुए डलहौजी भी पहुंच गई यात्र लेकिन रात्रि विश्राम डलहौजी से 27 कि-मी आगे बढ़ कर खज्जियार में किया।

हालांकि डलहौजी भी अपने आप में एक बहुत ही खूबसूरत हिल स्टेशन है, जहां सैलानियों की भारी भीड़ होती है। अन्य हिल स्टेशनों की ही भांति यहां भी गाड़ियों की खचा-खच और कन्धे से कन्धा टकराती भीड़ होती है, लेकिन मिनी स्विटजरलैण्ड कहा जाने वाला खज्जियार अपनी अलग ही खूबसूरती लिए है। देवदार के घने वृक्षों से घिरा खज्जियार का शान्त वातावरण का आकर्षण अद्भुद है। जम्मू एण्ड कश्मीर से हिमाचल पहुंचने के लिए हमने जिस बीहड़ रास्ते को पार किया था उस की थकान डलहौजी से बेहतर खज्जियार में उतारी जा सकती थी, इसीलिए डलहौजी से 27 कि- मी- और आगे बढ़ कर रात्रिविश्राम खज्जियार में करने के बाद हिमाचल में आगे के सपफ़र पर रवाना हुई यात्र। गग्गल-धर्मशाला होकर कागड़ा में लगाए गए वृक्षों को वयस्क होते देख आनन्द की अनुभूति हुई।

कांगड़ा में संजीव (रिंकू भाई) एवं अन्य आपरेटरों से भेंट कर बिलासपुर पहुंची यात्र। बिलासपुर डैम अब पूरी तरह से लबालब भरा हुआ दिखाई दिया, लेकिन पफ़ारेस्ट रेस्ट हाऊस की घास झंकाड़ बन गई थी, वहां लगाए गए पौधों का कुछ पता नहीं लग सका। बिलासपुर के स्कूल में लगाए गए पौधों की देखभाल ठीक-ठाक हो रही है। बिलासपुर से सीधे शिमला पहुंच खन्ना जी के साथ डिजीटल पर लम्बी चर्चा के बाद सोलन होते हुए चण्डीगढ़ पहुंची यात्र। चण्डीगढ़ क्लब में सभी पौधे सुरक्षित लहलहाते मिले। चण्डीगढ़ में सिद्दू-सन्दीप-राजेश मलिक आदि से भेंट कर यात्र नहान-पौन्टा साहिब के मार्ग से देहरादून होते हुए त्रफ़ृषिकेष पहुंची। हेमन्त गांधी अर्शपफ़ के साथ इंडष्ट्री पर विस्तृत चर्चा के बाद हरिद्वार मार्ग से नजीबाबाद, जमीना से घासपुर पहुंची यात्र, यहां अमरजीत सिंह से भेंट वाली के बाद यात्र का स्योहारा में चल रहे मुस्लिम समाज के धार्मिक सम्मेलन इजतमा के गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

इजतमा पर वहां के आमीर सहिब से जानकारी मिली एवं यात्र की जानकारी उनको दी गई, तत्पश्चात यात्र सीधेे मुरादाबाद पहुंची। मुरादाबाद आर-एन हन्टरकालिज में वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन राजीव जौहरी द्वारा रोटरी कल्ब अध्यक्ष एम एम गर्ग (सिविल लाइन मुरादाबाद) के सहयोग से किया गया। आर-एन- इन्टर कालिज मुरादाबाद का बहुत ही पुराना कलिज है, कालिज के प्रिंसिपल श्री गुप्ता जी के हाथों से कई पौधे कालिज में लगवाए गए। वृक्षारोपण कार्यक्रम में अजय टंडन, पुष्किन शर्मा, नवीन रस्तोगी, संजय बजाज एवं हिमांशु रस्तोगी आदि भी सहभागी बने। तत्पश्चात सीधे नैनीताल पहुंची यात्र। मुरादाबाद से नैनीताल के लिए मार्ग की दशा कापफ़ी खराब मिली क्योंकि अभी पिछले ही दिनों इस क्षेत्र में बाढ़ आई हुई थी। दिल्ली से यात्र पर रवाना होने के बाद घर-परिवार सब बहुत पीछे रह गया था, लेकिन अनुराग-सोनल सहित माही (पोती) के साथ कुछ क्षण नैनीताल में व्यतीत कर आगे की यात्र के लिए ताजगी समेट कर नैनीताल में बाबी भाई आदि के साथ इंडष्ट्री पर लम्बी चर्चा के बाद वहां से आगे बढ़ गई यात्र 5 सितंबर से 15 सितम्बर तक की यात्र का यह प्रथम चरण कहा जाएगा। यहां से आगे यात्र हाल जानने की लिए ‘यात्र-भाग दो’ की प्रतीक्षा करें।

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