चेतना यात्रा-7 (द्वितीय भाग) नैनीताल से नागपुर तक

दिल्ली से हरियाणा-पंजाब जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड का सपफ़र खासा थकान भरा रहा, लेकिन नैनीताल से पुनः ताजगी लिए यात्र आगे बढ़ी तो सबसे पहले हल्द्वानी में हुई बैठक में जानकारी मिली कि उत्तराखंड राज्य सरकार ने केबल टीवी आपरेटरों को एक दुधारू गाय मानते हुए लोकल चैनलों पर अलग ही तरह से कर लगाया है। प्रति चैनल 2000/ व 2400 रूपए एव 100/ रूपया अलग से प्रति कनैक्शन वार्षिक थोपा गया है। उनके आपरेटरों के खिलापफ़ अब सरकार के रिकवरी नोटिस भी जारी हो चुके हैं तब यह सूचना मिली है। जबकि अधिकांश आपरेटरों से सरकार वसूली कर भी रही है। इस कर के संदंर्भ में उत्तराखंड सरकार माननीय उच्चतम न्यायालय तक से अपने पक्ष में पफ़ैसला ले आई है, लेकिन हल्द्वानी के आपरेटर भाई तारीक का तर्क अलग ही है, उन्हें विश्वास है कि वह इस मामले में उत्तराखंड सरकार को हरा ही देंगे, हालांकि उनको भी सरकार का रिकवरी नोटिस मिल चुका है।


हल्द्वानी लम्बी वार्तालाप के बाद रूद्रपुर पहुंचते-पहुंचते कापफ़ी रात हो चुकी थी एवं रूद्रपुर में भी मिलना आवश्यक था। अतः यात्र के द्वितीय भाग का यहा पहला पड़ाव हुआ। अगली सुबह वहां के एक मात्र आपरेटर विनोद चावला जी के साथ इंडष्ट्री एवं अन्य मामलों पर लम्बी बातचीत कर यात्र आगे के लिए रवाना हुई। चावला जी को रिकवरी नोटिस नहीं आया है, क्योंकि एक सुधरे हुए व्यवसायी की तरह वह केबल टीवी व्यवसाय में संलग्न हैं और उन्होंने सरकारी पफ़रमान के साथ समझौता कर लिया है। रूद्रपुर से आगे बढ़ते हुए सीधे बरेली पहुंची यात्र, जहां कौशल भाई कई साथियाें सहित पफ़ूलों की मालाएं लिए यात्र का स्वागत करने के लिए प्रतीक्षारत थे। पूर्व में रोपे गए पौधे भी बरेली में लहलहा रहे हैं जानकर प्रसन्नता हुई। यहां भी डैन का झण्डा पफ़हरा दिया गया।

डिजीटल पफ़ीड भी शीघ्र ही आरम्भ होने वाली हैं एवं सभी एल-सी-ओ के साथ एम-एस-ओ- एल-सी-ओ- एग्रीमैंट भी हो गए हैं। एग्रीमेंट के कुछ प्वाइन्ट्स को लेकर जो किन्तु-परन्तु था उसका निवारण कर यहा से आगे बढ़ते हुए सीधे शाहजहांपुर पहुंची यात्र। चलते-चलते शाहजहांपुर के आपरेटर रविभाई के साथ भेंट-वार्ता कर कर लखनऊ के लिए बढ़ चली यात्र। शाहजहांपुर किसकी झोली में जाएगा यह अभी पफ़ाइनल नहीं हो सका है, लेकिन बिल्कुल पके आम की भांति ही प्रतीत हो रहा है। इसका श्रेय चैनल डिष्ट्रीब्यूटर्स को जाता है क्योंकि बार-बार बढ़ाई जाने वाली वसूली से निजात पाने का एकमात्र यही उपाय आपरेटराें को निकालना पड़ता है।


लखनऊ पहुंचते-पहुंचते रात ज्यादा ही हो चुकी थी अतः रात्रि भोज की दिक्कत रही। शाहजहांपुर से लखनऊ के मार्ग में कई जगह सड़क पर कछुए अपनी गर्दने बाहर निकाले आसमान की ओर निहारते दिखाई दिए, उनका सदेश समझ से परे था, लेकिन प्रतीत यही हो रहा था कि जैसे वह इस तरह कोई संदेश दे रहे हों। लखनऊ में डैन के प्रमुखों सुनील जौली, ओमेश्वर सहित तमाम अन्य आपरेटरों से भी इंडष्ट्री के भविष्य पर लम्बी चर्चा हुई। अनिल कपूर कमालिया जी सहित अन्य तमाम आपरेटरों के पूर्व में लगाए गए पौधों का निरीक्षण कर यात्र लखनऊ से कानपुर के लिए रवाना हो गई। कानपुर में सिटी केबल प्रमुख गोड साहब द्वारा बड़ी गर्म जोशी के साथ यात्र का स्वागत किया गया। सभी आपरेटरों के साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर गहन चिंतन हुआ एवं कानपुर केबल टीवी दर्शर्कों के लिए ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता के लिए विशेष संदेश रिकार्ड किया गया जिसे बाद में प्रसारित किया जाएगा। केबल टीवी दर्शकों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूक करने के लिए तकरीबन सभी शहरों में संदेश दिए जाने की कोशिश की जाती है।


आज बड़े वजन का भूकम्प भी भारत में आया है जिसका केंद्र सिक्किम रहा, वहां भूकम्प से भारी तबाही की खबरे आ रहा है। भूकम्प के झटके देश के अन्य क्षेत्रें में भी महसूस किए गए लेकिन सबसे ज्यादा क्षति सिक्किम में ही हुई है। बहरहाल कानपुर से पफ़तेहपुर होते हुए देर रात इलाहाबाद पहुंची यात्र। कानपुर में निकलते-निकलते संजीव दीक्षित से भी भेंट-वार्ता हुईं गंगा-यमुना, सरस्वती का संगम स्थान इलाहाबाद जहां कुम्भ मेला होता है उसी पवित्र शहर में यात्र का पड़ाव हुआ और सुबह वहां के आपरेटरों का स्वागत सत्कार स्वीकार कर भदोही के रास्ते वाराणसी पहुंच गई यात्र। यात्र का यह सपफ़र बार-अपनी गाड़ी की सेहत की ओर ध्यान खींच रहा था, क्योंकि लखनऊ अम्बर होटल की पार्किग में खड़ी अन्य इन्नोवा में हमारी गाड़ी कुछ ज्यादा ही बैठी हुई लग रही थी। इसी समस्या को लेकर हमने इलाहाबाद की टोयटा वर्कशाप में गाड़ी दिखलाई, तब उन्होंने सुझाव दिया कि यह वर्कशाप अभी हाल ही में ख्ुाली है, बेहतर रहेगा कि आप वाराणसी में दिखलाएं वहां यहा से ज्यादा काबिल मैकेनिक है। हमने वाराणसी पहुंच कर टोयाटा वर्कशाप में गाड़ी खड़ी की। गाड़ी को जैक पर लेकर जब ऊपर चढ़ाया गया तब यह भी जानकारी हुई कि फ्रयूल टैंक भी लीकेज है।

गाड़ी पूरी तरह से खाली कर देने के बावजूद भी जब दूसरी इन्नोवा की भांति नहीं उठ सकी तब उन्होंने शोकर चेंज किया लेकिन गाड़ी तब भी उतनी नहीं उठी, तब उन्हाेंने स्प्रिंग निकाल कर चैक किया जो दुरूस्त पाया गया, लेकिन प्रोब्लम बनी ही रही। अन्य इन्नोवा के मुकाबले में हमारी नई इन्नोवा पीछे से कापफ़ी बैठी हुई दिख रही थी, तब उन्होंने स्प्रिंग के नीचे एक-एक रबर गुटका का लगा दिया, तब भी दूसरी गाड़ियाें के मुकाबले में हमारी गाड़ी उन्नीस ही रही। आखिरकार वर्कशाप वालों ने एक दिन रूकने के बात की तब हमने उन्हें असमर्थता जता दी। इसी तरह फ्रयूल टैंक की लीकेज को भी उन्होंने एम-सील लगाकर टेम्प्रेरी किया, जबकि हम उनसे फ्रयूल टैंक बदल देने के लिए कह रहे थे। टोयोटा की गाड़ियां तो ठीक हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत गाड़ी के सामान को बदलने में आती है। छोटा-मोटा सामान तो महंगी कीमत पर सभी वर्कशाप में मिल जाता है, लेकिन कुछ बड़ी प्रोब्लम आ जाए तब आर्डर पर सामान बंगलौर से ही आता है, तब तक प्रतीक्षा करे। फ्रयूल टैंक के लिए भी स्थिति यही बनी हुई है। हालांकि यह गाड़ी अभी 30 अगस्त को ही दिल्ली टोयोटा शो रूम से ली गई हैं। वाराणसी टोयोटा से किया गया टैम्प्रेरी ट्रीटमेंट किसी काम नहीं आया, बल्कि वाराणसी में हाल्ट कर सुबह ज्यों ही आगे के लिए बढ़े तब टैंक की लीकेज बरकरार थी।


बहरहाल वाराणसी की प्रसिद्ध कचौड़ी का नाश्ता कर यात्र मुगल सराय के रास्ते बिहार की ओर बढ़ चली। वाराणसी में आलोक पारीख सहित अन्य आपरेटर भी दिल्ली गए हुए थे। अतः उनसे बिना मिले ही आगे बढ़ना हुआ। बिहार में मोहनिया आशा होते हुए पटना पहुंच आपरेटरों के साथ बैठक कर सीधे गया-बोधगया पहुंची यात्र, लेकिन बोधगया के आपरेटर भी कहीं अन्य व्यस्त दिखाई दिए, तब बिहार से झारखण्ड की ओर बढ़ गई यात्र। बिहार से झारखण्ड का यह रास्ता नैक्सलाइट एक्टिविटी के कारण कापफ़ी दुर्गम माना जाता है, तिस पर रात्रि पहर में यात्र आगे बढ़ रही थी। सड़के भी पूरी तरह से दुरूस्त नहीं थी, अचानक बड़े गहरे गड्ढे सामने आ जाते थे परन्तु आगे बढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। गया से डोबी होते हुए चम्पारन-बरही होते हुए सीधे हजारी बाग पहुंची यात्र, लेकिन हजारीबाग के आपरेटर बहुत जल्दी सोने के आदि है, अतः वह एडवास में होटल की बुकिंग नहीं करवा सके। मध्य रात्रि में किसी भी होटल में ठहर पाना।

इस शहर हजारीबाग में बहुत कठिन था, परन्तु एक उपकार नामक होटल में सिक्योरिटी वाले को यह विश्वास दिलाने में हम सपफ़ल हो गए कि हमसे उन्हें कोई खतरा नहीं है, इतना समझ आने के बाद उस सिक्योरिटी वाले ने हमारे लिए होटल की एन्ट्री खोल दी।


हजारीबाग होटल उपकार का वहां ठहरने का उपकार तो मिल गया लेकिन वाराणसी की कचौड़ियां अब तक पेट में कही गुम हो चुकी थी, भूख जोराें से लगी हुई थी, लेकिन खाने लिए पाने की कहीं कोई उम्मीद नहीं थी। वैसे भी इस क्षेत्र में रात्रि में लोग घरों से बाहर नहीं निकलते, लेकिन गाड़ी लेकर कुछ किलोमीटर इधर-उधर तलाशा तो खाने का एक ढाबा खुला मिल गया, वहां जो भी दाल-भात मिला लिया और पिफ़र होटल में आकर पेट भर लिया। दिनभर की थकान ने जल्द ही नींद में ले लिया। सुबह हजारी बाग के आपरेटरों के साथ बैठक कर शीघ्र ही आगे के सपफ़र के लिए बढ़ चली यात्र।

हजारीबाग से रामगढ़ होते हुए रांची पहुंच कर आपरेटरों को यात्र संदेश देते हुए बन्दू-तामर चाण्डिल होते हुए जमशेदपुर पहुंची यात्र। जमशेदपुर के आपरेटरों सहित गुड्डू भाई द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किया गया। इंडष्ट्री पर विस्तृत चर्चा के बाद रात्रि विश्राम जमशेदपुर में हुआ पिफ़र सुबह वहां निकट ही डालमा वाइल्ड लाइपफ़ देखने का मोह हम नहीं छोड़ सके। वाइल्ड लाइपफ़ से वापिस जमशेदपुर पहुंच कर शाम को इंडष्ट्री पर लम्बी वार्तालाप के कारण एक और रात वहीं ठहर जाना पड़ा, जबकि वहीं रूकने के लिए भारी बारिश ने भी अपना काम किया। एक रात अतिरिक्त जमशेदपुर में लगा दिए जाने के कारण दुर्गापुर से कोलकाता का रास्ता कट करते हुए सीधा उड़ीसा के लिए रवाना हो गई यात्र। कोलकाता में मंथन के साहा साहब एवं सिटी केबल के सुरेश सेतिया जी भी उपलब्ध नहीं थे, इसलिए बैस्ट बंगाल को कट करते हुए जमशेदपुर से रायरनगंज-जशीपुर शिमलीपाल होते हुए शिंगटाोड़ से केन्दुझर की ओर बढ़ती यात्र का रास्ता वैतरणी नदी ने रोक दिया।


उड़ीसा में भारी बारिस के कारण कई क्षेत्रें में बाढ़ आई हुई थी, जबकि कोलकाता-मुम्बई हाईवे को वैतरणी नदी के विकराल रूप ने दो दिनाें से रोका हुआ था। नेशनल हाईवे बन्द हो जाने के कारण मार्ग के दोनाें ओर हजाराें वाहन ट्रक जहां के तहा रूके हुए थे। मार्ग पर स्थित दाबों का राशन पानी खत्म हो चुका था। मार्ग पर आगे बढ़ना तो सम्मव ही नहीं था, क्योंकि वैतरणी पुल से भी 10-12 पफ़ुट ऊपर बह रही थी। अगर ओर बारिस हो गई तब हालात बद से बदतर हो सकते थे, लेकिन गनीमत यह थी कि बारिस पूरी तरह से बन्द थी और पानी तेजी से बह रहा था। सभी को उम्मीद थी कि कल दोपहर तक वैतरणी रास्ता दे सकती है, अतः हमें भी वहीं कही रात्रि विश्राम का ठिकाना तलाशना पड़ा क्योंकि वहां से पीछे जाने का भी कोई औचित्य नहीं था।

शिगटामोड़ से 20-24 किलोमीटर अन्दर जाकर एक करजिया कस्बा था। जहां ठहरनेे के लिए कोई इन्तजाम होने की उम्मीद थी। अतः वैतरणी के विकराल रूप एवं उसके कारण वहां पफ़ंसे वाहनों की स्मृतियों को समटते हुए हम शीघ्र ही करजिया पहुंचे। कराजिया में रात्रि विश्राम के लिए एक अच्छा गेस्ट हाऊस हमें मिल गया। यह गैस्ट हाऊस भी केन्दुझर आपरेटर जो कि अब कान्सुलर बन चुका है संदीप बेहरा के मामा जी का निकला, इसलिए वहां पर बाकी कोई परेाानी नहीं हुई। रात्रिविश्राम करंजिया में करने के बाद सुबह शीध्र ही अगले पड़ाव की ओर बढ़ गई यात्र। वैतरणी बिल्कुल शान्त अपनी हद में बह रही थी, जिसे पार कर केन्दुझर पहुंच संदीप बेहरा को बाद पीड़ितों से घिरा पाया, वहां बरसाती आदि का वितरण किया जा रहा था, लेकिन लेने वालों की लाइने खत्म नहीं हो पा रही थी।

दोपहर का खाना संदीप बेहरा परिवार के साथ कर यात्र आगे के लिए बढ़ चली। आगे के सपफ़र में दुर्गम पहाड़ियों के साथ सड़कों का हाल भी बहुत ज्यादा खराब हो रहा था लम्बा-लम्बा जाम लगा हुआ था, बामुश्किल बारकोट-दबगढ़ -ऊषाकोठी होकर देर रात यात्र सम्बलपुर पहुंची। यह पूरा रास्ताा नक्सलवादी क्षेत्र भी कहलाता है, इसी मार्ग पर चेतना यात्र-5 में एक रात ढाबे पर ही गुजारनी पड़ी थी, लेकिन लम्बा-लम्बा जाम और सड़कों पर गहरे गड्ढ़ाें के आलावा अन्य कोई परेशानी नहीं पड़ी हम सीधे-सीधे सम्बलपुर पहुंच गए। वहीं विश्राम कर अगली सुबह बारागढ़-सरायपल्ली-बासना, पिथौरा-तुमगांव अरंग होते हुए सीधे रायपुर (छत्तीसगढ़ं)पहुंच गई यात्र। सम्बलपुर से रायपुर का यह मार्ग भी नक्सल वादियों से पीड़ित क्षेत्र है। यहां तुमकुर में आज ही नकसल वादी हमला हुआ है जिसमें किसी सरपंच की हत्या हो गई है।

रात्रि विश्राम रायपुर में किया। यहा तक पहुंचते-पहुंचते गाड़ी के फ्रयूल टैंक का टपकना निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। नागपुर टोयोटा वर्कशाप को सूचित कर एडवांस में गाड़ी की सर्विस एव फ्रयूल टेंक बदलने के लिए कह दिया है। रायपुर से अहले सुबह निकलकर सीधे नागपुर टोयोटा वर्कशाप पहुंच कर गाड़ी सर्विस के लिए दी एवं उनसे फ्रयूल टैंक बदले देने की भी रिक्वेस्ट की, लेकिन सर्विस तो उन्होने का दी, लेकिन फ्रयूल टैंक उपलब्ध ना होने का रोना रोकर पिफ़र वही टैम्प्रेरी ट्रीटमैंट कर गाड़ी हमें थमा दी। नागपुर की टीम भी अब नागपुर से आगे महाराष्ट्र में हमारे साथ हो गई ऐसा पहली बार हुआ कि हमने नागपुर हाल्ट नहीं किया। शाम को टोयटा वर्कशाप से गाड़ी लेने के बाद नागपुर आपरेटरों द्वारा गर्मजोशी से यात्र का स्वागत किया गया, उनके साथ इंडष्ट्री की भावी सम्भावनाओं पर गहन चर्चा के बाद यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली। महाराष्ट्र में अहमद नगर-पून मार्ग पर रलिगांव सिद्धि (अन्ना हजारे के गांव) की ओर यात्र बढ़ चली।

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