(16 अक्टूबर से 25 अक्टूबर)(पांचवा भाग)(तमिलनाडू से कान्हा)

रसमलाई के बाद यदि अदरक खाने के लिए दिया जाए तो कैसा लगेगा, कुछ वैसा ही फर्क केरल की हसीन वादियों को पार कर तमिलनाडू में पहुंचने पर हुआ, क्योंकि केरल जैसी प्राक्रतिक सम्पदा तो तमिलनाडू को मिली ही नहीं है तिस पर केबल टीवी व्यवसाय में भी केरल के मुकाबले में तमिलनाडू के हालात बिल्कुल ही अलग है। केरल की चिनार वाइल्ड लाइफ सैन्चुरी से होते हुए जैसे ही तमिलनाडू में प्रवेश होता है पूरा प्लेन एरिया शुरू हो जाता है, वह पहाड़ियां वहीं थम जाती हैं।
तमिलनाडू में पहला पड़ाव त्रिची रहा जिसे त्रिचुरापल्ली के रूप में जाना जाता है। निक नेम त्रिची है जबकि त्रिची से पहले डिण्डीगुल भी एक बड़ा शहर बीच में आता है एवं उडुम्मलाई पेट्टा केरल पार करते ही पड़ता है। आज से ही नवरात्रे भी शुरू हुए है यानिकी दशहरा की शुरूआत हो गई है।

त्रिची पहुंचते-पहुंचते रात्री के साढ़े दस बज चुके थे लेकिन होटल चैकिन करने तक बारह बज गए थे, क्योंकि जिस किसी भी ढंग के होटल में जाते थे पता चलता था कि फुल है, कोई भी रूम उपलब्ध नहीं है। लगातार बारिश भी हो रही थी और अभी भोजन भी करना था जो बढ़ते जा रहे समय के कारण और भी कठिन हो गया था, जबकि खाना तो यहां सिर्फ भूख मारने के लिए ही खाया जा सकता है उत्तर भारतीयों के लिए, तिसपर पहला नवरात्र। यूं तो कहीं पहुंचने से पूर्व ही हमारे होटल में ठहरने का बन्दोबस्त ऑपरेटरों के द्वारा हम करवा भी लेते है, लेकिन तमिलनाडू का यह रूट पूर्व निर्धारित नहीं था। केरल से थोड़ा चेन्ज कर यह नया रूट बनाया गया था। इसी रूट पर डिण्डीगुल में तमिलनाडू केबल टीवी ऑपरेटर्स एसोसिएशन प्रमुख गोकुल भाई का भी ठिकाना है, लेकिन बीमारी वश वह अस्पताल में एडमिट हें, उनसे सम्पर्क नहीं हो सका, अतः त्रिची में होटल मिलने में परेशानी आई।

इस परेशानी का कारण यह रहा कि नवरात्रे शुरू होने के साथ-साथ यहां शादियों का सीजन भी शुरू हो जाता है। इन नवरात्रें में यहां शादियां की जानी ज्यादा शुभ मानी जाती हैं। अतः सभी अच्छे होटल शादियों के कारण अगले पांच दिनों तक के लिए बुक हो चुके है। इसलिए रसमलाई के बाद स्वाद अदरक जैसा हो गया। केरल से तमिलनाडू घुसते ही बामुश्किल एक होटल में रात्रीविश्राम के लिए जगह तो मिल गई लेकिन खाना—!तमिलनाडू में दूसरी सबसे बड़ी समस्या भाषा की भी आती है कि यहां हिन्दी तो छोड़ो अंग्रेजी जानने, समझने वालों का भी अभाव हैं। बहरहाल! त्रिची में रात्रीविश्राम कर सीधे तंझावर के लिए रवाना होना पड़ा क्योंकि केबल टीवी ऑपरेटरों ने यात्र के स्वागत का प्रबंध तंझावर शहर में ही रखा हुआ था। हालांकि कल जबकि ऑपरेटरों की मदद की ज्यादा जरूरत थी तब गोकुल या प्रभाकर दोनों में से कोई नहीं मिल सका था, लेकिन आज सुबह से यात्र के स्वागत की प्रतीक्षा तंझावर में जा रही थी, वहां परम्परागत तरीके से यात्र क स्वागत-सत्कार किया गया। डैस पर ऑपरेटरों का मार्गदर्शन कर यात्र तंझावर से नागापट्टनम पहुंची।

नागापट्टनम में भी ऑपरेटर प्रतीक्षारत थे वहां से सीधे कराईकाल में मीटिंग हुई। कराईकाल भी माहे की ही तरह से पाण्डीचेरी का एक हिस्सा है। यहां तमिलनाडू राज्य का राज नहीं बल्कि पाण्डीचेरी का ही राज चलता हैं। इसलिए यहां की स्थिती तमिलनाडू के ऑपरेटरों से बिल्कुल अलग है।


तमिलनाडू में केबल टीवी व्यवसाय पूरी तरह से वहां की सरकार के ही अधिग्रहण में चल रहा है केबल टीवी ऑपरेटरों की मनमानी के अन्तर्गत नहीं। केवल चैन्नई में कुल दो एम-एस-ओ- जैक कम्युनिकेशन एवं केएल केबलविजन के अतिरिक्त पूरे तमिलनाडू राज्य में उपलब्ध पे चैनलों की बिलिंग सिर्फ वनविन्डो तमिलनाडू अरासु केबल नेटवर्क लिमिटेड पर होती है। वहां के केबल टीवी ऑपरेटरों को मात्र 70/- रूपए ही प्रति उपभोक्ता प्रति माह लेने का निर्देश है एवं इन 70/- रूपए में से 20/- रूपए अरासु केबल के खाते में जमा करवाने होते हैं। यह 20/- रूपए टैक्स नहीं है, बल्कि जो भी कण्टेंट वहां उपलब्ध है उसके एवज में ऑपरेटरों से लिए जाते है। हालांकि वहां अनेक हैडेण्ड हैं, लेकिन सभी का नियन्त्रण अरासु केबल द्वारा ही किया जाता है। डैस की तैयारी में तमिलनाडू के ऑपरेटर भी छटपटा रहे हैं, इसके लिए तंझावर के ऑपरेटरों द्वारा डैस लायसेंस भी ले लिया है, लेकिन अभी तो चैन्नई में ही डैस नहीं हो पा रहा है।

चैन्नई में 2003 में कैस जिस तरह से लागू हुआ था वह वहीं तक ठहरा हुआ है, वहां केवल दो एम-एस-ओ- ही केबल नेटवर्क चला रहे हैं लेकिन फिलहाल डैस की तैयारियां बिल्कुल नहीं है जबकि डैस के प्रथम चरण में चैन्नई भी शामिल है और एक नवम्बर सामने खड़ा है। कराईकाल के ऑपरेटर डैस की तैयारी कर रहे हैं, क्योंकि वह पोण्डीचेरी के कानून के अंतर्गत आते हैं, परन्तु डैस पर चले जाने के बाद कराईकाल के सिग्नल जब आस पास के क्षेत्रें में होकर तमिलनाडू के राज्य में पहुंचेंगे तब कानूनी स्थिती क्या होगी यह देखने लायक होगा। कराईकाल से सीधे यात्र पोण्डीचेरी पहुंची, यहां भी होटलों की स्थिती तमिलनाडू जैसी ही है, लेकिन रात्रीविश्राम के लिए एक होटल तो मिल गया परन्तु खाने की समस्या जस की तस रही।
्रंपोण्डीचेरी में कुल चार एम-एस-ओ- हैं जो अपना-अपना नेटवर्क चला रहे हैं, वह भी डैस के लिए तैयार बैठे हैं परन्तु तमिलनाडू सरकार की भांति यहां भी वैसा ना हो जाए, इसका डर भी उनमें बैठा हुआ है।

वहां के ऑपरेटरों के साथ भेंट कर यात्र चैन्नई के लिए रवाना हंो गई। पोण्डीचेरी से चैन्नई के मार्ग पर पोण्डीचेरी का समुन्द्र काफी दूर तक साथ-साथ चलता है। साथ में समुन्द्र और ऊपर से लगातार हो रही बारिश के कारण गाड़ी के शीशे बंद कर आगे बढ़ रही थी यात्र, कि दिखाई दिया कि समुन्द्र के किनारे-किनारे नमक उद्योग का इधर बड़ा काम है। कई जगह नमक के बड़े-बड़े ढ़ेर बिटोड़ों की भांति बने हुए थे। कई को त्रिपाल से तो अधिकांश घास फूंस से ढ़के थे तो काफी बिना ढ़के भी बिटोरे से ढ़ेर बन खड़े थे।

इन्हीं में से एक बढ़े से ढ़ेर को बोरियों में भर-भर कर ट्रक में लोड किया जा रहा था। बड़ा अजीब सा दृश्य था, बारिश में नमक के ढ़ेर को खुरच-काटकर बोरियों में भर ट्रक में लाद रहे मजदूर अजीब से प्रतीत हो रहे थे। हम उन्हीं के बीच अपनी गाड़ी लिए पहुंच गए और उस सारे दृश्य को कैमरों में कैद किया, देखा कि मजदूर भी एक परिवार के ही सदस्य थे, इनमें पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी काम में लगी हुई थीं। लगातार पड़ रही बारिश में भीगते हुए यह सब नमक के टीले को खुरच-खुरच कर बोरियां में भर कर बोरियों के मुहं की सिलाई कर ट्रक में लाद रहे थे। पूरी तरह से तरबतर। नमक का इनके शरीर पर क्या प्रभाव होता होगा इसकी परवाह तो वहां किसी को भी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने नमक के प्रभाव से सुरक्षित रहने के लिए कोई भी उपाय नहीं किए हुए थे।

ऐसे कठिन कार्य में सलंग्न उस परिवार के सदस्यों को देखकर मुंह से ‘मेरा भारत महान’ निकलता है। बहरहाल! यात्र पोण्डीचेरी से सीधे चैन्नई पहुंची। एक नई एसोसिएशन के ऑफिस में किशाेर भाई के साथ वहां के ऑपरेटरों से पहले तमिलनाडू चैन्नई और फिर डैस एवं भावी सम्भावनाओं पर लम्बी चर्चा हुई। इस मीटिंग में जानकारी मिली कि मात्र 15» ही सैटॉप बॉक्स चैन्नई में लगे हैं, वह भी कैस के समय में। यहां डैस के लिए कम से कम छः महीने चाहिए होंगे, लेकिन डैस पर जाने के लिए अभी तक डिजीटल एड्रोसिबल सिस्टम के हैडेण्ड के लिए अरासु केबल (सरकार) का हैण्डर ही किसी को नहीं दिया जा सका है।
डैस के प्रथम चरण में भले ही चैन्नई भी शामिल हो लेकिन पहली नवम्बर को वहां डैस इम्प्लीमेंट किए जाना किसी भी हालत में सम्भव नहीं है। तमिलनाडू सरकार अपनी असर्मथता केन्द्रीय सरकार के पास लिख कर भेज चुकी है, लेकिन केन्द्रीय सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। डैस इम्प्लीमेंट के लिए चलाए जा रहे प्रचार अभियान में चैन्नई के केबल टीवी उपभोक्ताओं को भी वही संदेश दिया जा रहा है जो दिल्ली के उपभोक्ताओं को दिया जा रहा है। तमिलनाडू में अन्य ऑपरेटर भी डैस की तैयारी कर रहे है, वहां डैस के लिए एम-एस-ओ- लायसेंस भी लिए गए हैं, लेेकिन वहां के सरकारी निर्देश के विरूद्ध जा पाना किसी भी ऑपरेटर के लिए सरल नहीं होगा, परन्तु सरकारी व्यवस्था गर यूं ही लाचार रही तब तमिलनाडू में अनेक डिजिटल हैडेण्ड लगने की सम्भावनाएं हैैं। बहरहाल! चैन्नई से यात्र तिरूपती जी की ओर बढ़ चली।

देर रात पहुंचना हुआ तिरूपती जी, क्योंकि चैन्नई में ही भारी जाम और बारिश के चलते दो ढ़ाई घण्टे खराब हो गए। चैन्नई-तिरूपती मार्ग भी नया बनाया जा रहा है, जिसके कारण यात्र और थकाऊ हो जाती है, इसलिए अर्धरात्री में पहुंचकर होटल मुश्किल से मिला क्योंकि दशहरा के कारण ब्रहमोत्सव भी जारी है तिरूपती जी में। ऑपरेटर राजशेखर रेड्डी हैदराबाद गए हुए हैं अतः उनसे वहीं भेंट होगी, लेकिन इस बार तिरूपती जी मन्दिर जाना नहीं हो सका सीधे हैदराबाद के लिए बढ़ी यात्र। यहीं से थोड़ा रूट भी चेंज किया गया यात्र का, क्योंकि दशहरा के कारण आन्ध्रप्रदेश में भी ऑपरेटरों का मिलना थोड़ा कठिन हो जाता है। कड़प्पा में ऑपरेटरों की मीटिंग के बाद यात्र कुर्नूल होते हुए नन्दयाल पहुंची।

आन्ध्रप्रदेश में दशहरापर्व के लिए नन्दयाल बड़ा प्रसिद्ध है, यहीं पर पांच दिन का रामलीला जैसा कार्यक्रम आयोजित होता है। आयोजन आज से ही आरम्भ हुआ है, इत्तेफाकन जब हम आयोजन में पहुंचे। सबसे पहले कर्ण का रोल पात्र द्वारा किया गया और उसके बाद सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र का डोम वाला रोल एक पात्र द्वारा किया गया। इसी प्रकार से भिन्न-भिन्न पात्रें के रोल यह कलाकार करते हैं। श्रेष्ठ कलाकारों को पुरस्कृत किया जाता है। इस कार्यक्रम को देखने के लिए दूर-दराज क्षेत्रें से भी भारी संख्या में श्रद्धालुजन नन्दयाल आते है। नन्दयाल के ऑपरेटरों द्वारा इस कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया जा रहा है। नन्दयाल दशहरा कार्यक्रम का स्वरूप उत्तर भारत में जैसे रामलीलाएं होती हैं, उनसे कुछ मिलता-जुलता ही था। इस कार्यक्रम में सिर्फ राम पर ही आधारित कार्यक्रम नहीं होता बल्कि द्वापर-त्रेता और सत्तयुग के प्रमुख पात्रें को अपने-अपने तरीके से प्रदर्शित करते हैं कलाकर। नन्दयाल से यात्र सीधे हैदराबाद पहुंची।


आन्ध्रा में दशहरा की धूम के साथ-साथ शनिवार-रविवार भी है अतः ऑपरेटर अपने परिवारिक कार्यों में व्यस्त होने के बावजूद भी हैदराबाद में एक बड़ी मीटिंग की व्यवस्था में लगे हुए मिले। रविवार को ऑपरेटरों की मीटिंग में यात्र का भव्य स्वागत हुआ। मीटिंग को संबोधित कर ऑपरेटरों के साथ भोजन किया। इन ऑपरेटरों में तीन ऑपरेटर भिन्न दलों से निवार्चित निगम पार्षद भी थे।


हैदराबाद में ही गाड़ी का व्हील बेलैंसिग एण्ड अलाईमैंट व सर्विस भी करवाई, साथ ही गंदे कपड़े भी लॉण्ड्री को दिए जो कल मिलेंगे। रविवार काफी व्यस्त रहा हैदराबाद में, सोमबार को ड्राईक्लीनर ने कपड़े देने में दोपहर ही कर दी, क्योंकि बिजली ही वहां लेट आई। हैदराबाद से निजामाबाद पहुंची यात्र, वहां के हालात बदले से प्रतीत हुए। निजामाबाद के ऑपरेटर साहनी साहब से भेंट नहीं हो सकी जबकि एक नया ऑपरेटर वहां अपना कन्ट्रोल रूम लगाए बैठा है। एक अन्य ऑपरेटर को ढूंढकर वहां का हाल जानने की कोशिश की तब जानकारी मिली कि वहां चल रहे तेलंगाना आन्दोलन का प्रभाव साहनी जी पर पड़ा है, उनका कन्ट्रोल रूम भी बंद है एवं वह हैदराबाद में है। साहनी जी एक बड़े और दबंग ऑपरेटर हुआ करते थे निजामाबाद में, परन्तु अब वहां की स्थितियां बहुत बदली सी हैं। निजामाबाद से आदिलाबाद होते हुए सीधे वर्घा (महाराष्ट्र) पहुंची यात्र। महाराष्ट्र-आन्ध्रा बोर्डर का यह क्षेत्र अपनी-अपनी भिन्न सस्कृतियों के कारण एकदम बदला सा लगता है।

महाराष्ट्र लगते ही दशहरा के कार्यक्रमों की अलग शैली गरबा की धमक आनी शुरू हो गई। वर्घा के ऑपरेटर मनीष के द्वारा वहां रात्रीविश्राम के लिए एक होटल में एडवांस बुकिंग करवा दी गई थी, परन्तु होटल में नहीं वहां सर्किट हाऊस में रात्रीविश्राम कर अगली सुबह ऑपरेटरों से मिलकर यात्र नागपुर के लिए रवाना हुई। गुजरात की ही तरह वर्घा भी महात्मा गान्धी जी से जुड़ा हुआ है, अतः यह भी महाराष्ट्र का एक ड्राई शहर है। वर्घा से नागपुर बहुत दूर नहीं है, दोपहर में ही नागपुर पहुंचकर पहले दैनिक भास्कर में समूह सम्पादक प्रकाश दुबे जी के साथ भेंट की और फिर वहां के ऑपरेटरों द्वारा आयोजित मीटिंग को सम्बोधित किया। ऑपरेटरों के साथ नागपुर के एम-एस-ओ- की ड्रैंस पर तैयारी भी अन्य शहरों से अलग नहीं है। सभी शहरों में एम-एस-ओ- फिलहाल अपना-अपना क्षेत्र विस्तार करने में प्रयत्नशील है।

रात्रीविश्राम नागपुर में ही वहां के ऑपरेटरों के साथ चली लम्बी चर्चा के साथ हुआ। सुभाष बान्तै सहित नरेन्द्र-ठाकरे एवं मजहर व गोटू भाई आदि भी देर रात तक साथ रहे। नागपुर में भास्कर गरबा-डाण्डिया कार्यक्रम का आनन्द लिया। डाण्डिया का यह कार्यक्रम नौ दिनों तक चलता है जिसे दैनिक भास्कर द्वारा आयोजित किया जाता है। नागपुर में नवभारत व अन्य समाचार पत्रें द्वारा भी ऐसे आयोजित करवाए जाते हैं।


नागपुर से अगले दिन यात्र सीधे मध्य प्रदेशं में कान्हा नेशनल पार्क के लिए रवाना हो गई। महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश का यह बार्डर क्षेत्र पूर्णतया आदिवासी बहुल क्षेत्र है। दूर तलक जंगल अथवा कहीं-कहीं छोटे-छोटे गांव जहां आदिवासियों का बसेरा। दशहरा उत्त्सव की धूम जगह-जगह थी, क्योंकि नवरात्रें की यह आखिरी शाम जो थी, कल तो विजय दशमी है अतः दशहरा मनाया जाएगा। रात में कान्हा नेशनल पार्क पहुंच गई यात्र। बिल्कुल ग्रामीण क्षेत्र यहां भी दशहरा कार्यक्रम की गून्ज थी। क्षेत्र के आदिवासी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम कर रहे थे। उसकी थोड़ी सी फुटेज उठाई एवं कान्हा के फारेस्ट में मध्य प्रदेश टूरिज्म द्वारा बने रात्रीविश्राम गृह में ठहरने का प्रबंध किया, परन्तु मध्य प्रदेश टूरिज्म द्वारा बनाए गए वह विश्राम गृह इतनी बत्तर हालत में है कि वहां से अपना सामान उठाकर वापिस वहां स्थित प्राइवेट रिसोर्ट्स को तलाशना पड़ा।

चन्दन रिसोटर््स में रात्रीविश्राम किया। यह रिसोर्ट्स वहां मुख्य मार्ग पर ही स्थित है, इसका प्रमुख आकर्षण इसकी खुली रसोई है जो वहां से गुजरने वालों का ध्यान खींचती है। यहां पता चला कि कल बुधवार होने के कारण पार्क बन्द होगा। मध्यप्रदेश में इन पार्काे का साप्ताहिक अवकाश भी होता है, यह यहीं पहुंचकर पता चलता है। साप्ताहिक अवकाश के कारण कान्हा पार्क में तो आज जाना नहीं हुआ, वहां के लिए एक और दिन यहीं ठहरने का निर्णय लिया, लेकिन आज विजय दशमी पर्व है अतः सर्वप्रथम घर परिवार को दशहरा की शुभकामनाएं देकर यहां के आदिवासियों द्वारा दशहरा मनाने के कार्यक्रम में भाग लिया। दशहरा पर मुख्यतः मूर्तिविसर्जन का कार्यक्रम होता है यहां, लेकिन सुबह से ही माता के भजन-हवन शुरू हो जाते है। झांकिया निकाली जाती है माता की और सारे रास्ते सभी आदिवासी नाचते-गाते माता की अर्चना करते हुए नदी तक मूर्ति विसर्जन के लिए जाते हैं।


इनमें से अनेक महिलाएं लड़कियां भक्तिभाव में कुछ ज्यादा लीन हो जाती है, जहां वह एक तरहसे अपनी सु६-बु६ भी खो देती हैं भक्तिभाव में। पूरे रास्ते में अपने-अपने घरों से निकलकर आदिवासी महिलाएं मूर्ति पूजा करतीे हैं और मार्ग में आने वाले समस्त मन्दिरों में भी पूजा-अर्चना की जाती है। इस प्रकार सुबह से आरम्भ हुई मूर्ति विसर्जन की शोभा यात्र को शाम में जाकर नदी में विसर्जित किया गया। मूर्ति विसर्जन कार्यक्रम के बाद वहां लगी एक हाट भी हमने कैमरे में कैद किया। इस हाट में दूरदराज क्षेत्रें से आदिवासी यहां पहुंचे है। उनके लिए सजा यह हाट भी अपने आप में कान्हा पहुंचे टूरिस्ट के लिए एक बड़ा आकर्षण है। कान्हा में आज अवकाश होने के कारण वहां पहुंचे देश-विदेश के सैलानियों के लिए आदिवासियों के दशहरा महोत्सव से काफ्रफ़ी राहत मिली और बहुत कुछ नया देखने को मिला। दशहरा महोत्सव के बाद कान्हा टाइगर रिजर्व नेशनल पार्क का विजिट कर पाना भी अब एक टेढ़ी खीर हो गया है।


शाम को फॉरेस्ट ऑफिस जाने पर मालूम हुआ कि पार्क में प्रवेश के लिए जितनी गाड़ियों को अनुमति दी जाती है वह पहले से ही बुक की जा चुकी है, लेकिन उनमें से गर कोई केंसिल होती है तब वह बुकिंग किसी दूसरे को दी जा सकती है, उसके लिए सुबह की प्रतीक्षा करनी होगी। सुबह 5-00-5-30 बजे फॉरेस्ट ऑफिस के बाहर लम््रं्रंबी लाइन लग जाती है। वहां पहले आओ पहले पाओ के कारण कान्हा घूमने आए टूरिस्ट सुबह से ही खड़े हो जाते है, लेकिन जरूरी नहीं कि सभी को अन्दर जाने का अवसर मिलें। कान्हा का आकर्षण चेतना यात्र-8 को नागपुर से कान्हा नेशनल पार्क तक तो खींच लाया, लेकिन यहां की मुश्किलें तो और लम्बी होती जा रही थीं, आखिरकार चन्दन रिसोर्ट में ही ठहरे एक विदेशी टूरिस्ट के साथ हमें भी कान्हा विजिट का अवसर मिला। वह टूरिस्ट अकेला था और हम तीन अतः एण्ट्री सहित जिप्सी का खर्चा शेयर कर कान्हा टाईगर रिजर्व नेशनल पार्क देखने का सौभाग्य प्राप्त हो सका।

कान्हा पार्क मध्य प्रदेश के अन्य पार्काे से कहीं ज्यादा घना व आकर्षक है। यहां जंगली भैंसे, बारह सिंहे, जंगली कुत्ते भी हैं जबकि टाईगर-लेपार्ड सहित हिरनों की भिन्न प्रजातियां तो हैं ही। कार्बट की भांति हाथियों के झुण्ड नहीं हैं यहां। बांस और साल का घना जंगल है कान्हा। यात्र के इस भाग को कान्हा तक ही सीमित रखते हैं, क्योंकि जंगल से निकल कर शहर का भाग अगले अंक से शुरू करेंगे। क्योंकि जंगल के स्वाद में शहर मिला देने से जंगल का जायका भी खत्म हो जाएगा अतः यात्र का यह भाग कान्हा पर ही फुलस्टॉप करते हैं।

Add a Comment

Your email address will not be published.