24 सितम्बर से 3 अक्टूबर(तृतीय भाग)(भुज से महानगरी मुम्बई तक)

कच्छ रन की भिन्नता के साथ-साथ यह भी बताना आवश्यक है कि 24 सितम्बर को ही ज्येष्ठ पुत्र अनुराग का भी जन्मदिन आता है, लेकिन सन् 2005 से आरम्भ की गई चेतना यात्र के कारण किसी भी वर्ष उसके साथ उसका जन्मदिन मनाने का अवसर नहीं मिल सका है। यात्र के दरमियान मिस करने में अनुराग का जन्मदिवस भी शामिल है, जबकि विजय दशमी का पूजन किए तो अब सात वर्ष यात्र को दिए ही जा चुके हैं और आठवीं यात्र के साथ दशहरा पर्व को भी अब इस यात्र में समर्पित किया जाएगा। पूरे भारत को अपना घर एवम् समस्त देशवासियों को परिवार मान लेने के बाद ऐसा कभी प्रतीत भी नहीं हुआ कि विजय दशमी का पूजन सिर्फ अपने घर में ही कर हम दशहरा मना सकते हैं, अपितु कभी आन्ध्र प्रदेश तो कभी मैसूर तो कभी तिरूपाति जी में दशहरा पर्व का आनन्द लिया है यात्र के दौरान।

वास्तव में हमारा देश विविधताओं से लबालब भरा हुआ है। इसे जितना भी नजदीक से देखो हर बार नया और खूबसूरत लगता है। एक बाप की ओर से अपने जन्मदिन पर बेटे को अवश्य किसी गिफ्रट की अपेक्षा होती होगी जो मैं बीते सात वर्षाे के बाद इस आठवीं यात्र में भी नहीं दे पाने का एहसास कर रहा हूं, हालांकि यात्र भुज से आगे बढ़ रही है। आगे बढ़ते हुए तकरीबन एक सौ किलोमीटर के फांसले पर एक प्रसिद्ध मन्दिर ‘माता नौ मद्य’ आया जिसकी मान्यता बहुत ज्यादा है। हमने भी मन्दिर में दर्शन किए। यहां आकर मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है, ऐसा कहना है यहां आने वाले भक्तों का, दर्शन तो किए लेकिन मां से मन्नत मांगने का हमें ध्यान ही नहीं रहा, और यात्र यहां से गुजरात के मैप में दिखाए जाने वाले अन्तिम शहर लखपत की ओर बढ़ चली। बीच में एक प्राचीन गांव घड़ौली और जारा भी देखा, कहा जाता है कि जारा में कभी कोई युद्ध हुआ था, लेकिन वहां ऐसे कोई अवशेष हमें नहीं मिल सके।

चलते-चलते सुनसान रास्तों को पार करते हुए मोदी के गुजरात में पनचक्कियों के पावर प्लांट सहित साफ-सुथरी चमचमाती सड़कें सफर को आरामदायक बनाती हैं। शाम ढ़लने के साथ-साथ यात्र गुजरात के अन्तिम किनारे स्थित लखपत पहुंच गई। बड़ी विचित्र सी एक उजड़ी हुई बस्ती सी दिखाई दी, हमें लखपत के रूप में। सामने ही झण्डा साहिब को देखा तो कोई गुरूद्वारा होेने का आभास हुआ अतः सीधे उसी ओर बढ़ चले कदम। गाड़ी को बाहर खड़ी कर गेट के अन्दर प्रवेश किया तो वहां वाकई गुरूद्वारा ही मिला। गुरूद्वारे में श्री निर्मलए बाबा (सरदार जी-पाई जी के रूप में) मिलें। बाबा जी को अपना परिचय देकर हमने वहां स्थित गुरूद्वारे के बारे में जानना चाहा, तब वह गुरूद्वारे के मुख्य द्वार खोलते हुए हमें सीधे दरबार में ले गए जहां गुरूग्रन्थ साहिब पूजा स्थान था।

इस गुरूद्वारे की प्राचीनता तो वहां की दर-ओ-दीवार बता ही रहीं थी, लेकिन भाई निर्मलए बाबा द्वारा सुनाई गई हिस्ट्री के अनुसार यह विश्व का पहला गुरूद्वारा है का दावा भाई जी कर रहे थे। उनका कहना था कि गुरूनानक देव जी महाराज सवा महीना यहां रूके थे और यहीं से वह मक्का-मदीना गए थे। लखपत से पहले उन्होंने रास्ते में जहां पानी पिया यह विश्व का पहला गुरूद्वारा है का दावा भाई जी कर रहे थे। उनका कहना था कि गुरूनानक देव जी महाराज सवा महीना यहां रूके थे और यहीं से वह मक्का-मदीना गए थे। लखपत से पहले उन्होंने रास्ते में जहां पानी पिया था वहां नानक तालाब आज भी है। भाई जी का कहना था कि यह जिस लखपत को आज यहां उजड़ी हुई स्थिति में आप देख रहे हैं, यही भारत का कभी सबसे बड़ा सी-पोर्ट हुआ करता था। दुनियाभर के जहाजों का यहां आना-जाना हुआ करता था, बहुत ही व्यस्ततम पोर्ट हुआ करता था लखपत। प्रत्येक दिन की आमदनी तब एक लाख रूपए इस पोर्ट से हुआ करती थी, जिसके कारण यह लखपत कहलाया। यहां समुन्दी पत्थरों (विशेष प्रकार के समुन्द्री पत्थर) की मुद्रा भी कभी प्रचलन में हुआ करती थीं।

समुन्द्र के साथ-साथ यहां सिंधु नदी भी बहा करती थी। गुजरात का बहुत ही व्यस्त और सम्पन्न क्षेत्र हुआ करता था यह लखपत। यहां चावलों की फसल भी कभी हुआ करती थी, यहां का चावल लाल रंग का हुआ करता था। कराची जोकि अब पाकिस्तान का शहर है से आने वाले व्यापारी इसी मार्ग से बुधबंदर (पोर्ट) आया करते थे, वह साथ में तम्बाकू पत्ती, बीड़ी पत्ता और गुड़ लाया करते थे, जबकि माण्डवी बंदरगाह पर खजूर, गुड़ सहित मशीनों के लिए ब्लैक ऑयल भी आता था। भूकम्प आने के बाद यहां सब कुछ उलट-पलट हो गया, यहां से समुन्द्र काफी दूर चला गया, सिन्धु नदी लुप्त हो गई और किनारे दलदली हो गए, पूरी बस्ती ही उजड़ गई। यहां रहने वाले सब चले गए, बस अब सिर्फ अवशेष ही शेष रह गए हैं।

लेकिन सीमा सुरक्षा बल को यहां तैनात देखकर उसका भी कारण जानने की कोशिश की तब जानकारी मिली कि मात्र 50-70 किलोमीटर दूर ही है यहां से पाकिस्तान की सरहदें इसी तरह वहां भी दलदली क्षेत्र है। सावधानी वश यहां तैनाती है क्योंकि घुसपैठियों का कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है। हालांकि इस सीमा से कभी कोई घुसपैठ नहीं हुई है, क्योंकि दोनों देशों की सीमाएं मीलों दलदली हैं। कहां समुन्द्र है और कहां दलदल पता ही नहीं लगता है अतः इस मार्ग से किसी को घुसपैठ करने की सोचना भी आत्महत्या जैसा ही होगा। फिर भी सावधानी वश पहरा आवश्यक है।

लखपत से वापसी करते हुए काफी रात हो चुकी थी, अतः बहुत ज्यादा लम्बा सफर कर पाना कठिन हो गया था, लेकिन नजदीक की किसी बस्ती में पहुंचने के लिए भी 70-80 किलोमीटर जाना ही था अतः यात्र लखपत से आगे बढ़ते हुए नारायण सरोवर पहुंची। यह भी एक ऐतिहासिक स्थान मिला साथ में धार्मिक मान्यता वाला भी। कहा जाता है कि मानसरोवर-विंदुसरोवर-पम्पा सरोवर और नारायण सरोवर कुल चार सरोवर ही हैं जहां स्नान करने से जीवन को पुण्य (मुक्ति) मिलता है। मान सरोवर में स्नान करने वालों को भी नारायण सरोवर में स्नान किए बिना तपस्या पूर्ण नहीं होती है। यहां इस सरोवर की रचना कैसे और कब हुई के बारे में हमने नारायण सरोवर के मैनेजर सुरेन्द्र कुमार ठक्कर से जानकारी लेने की कोशिश की।

उन्होंने बताया कि कभी यह ऋषि मुनियों का तपस्या स्थान हुआ करता था, अतः उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं नारायण प्रकट हुए, उन्हाेंने तपस्वियों के लिए अपने दाय-पावं के अंगूठे से पृथ्वी से यहां जलबहाव करवाया तभी से यहां सरोवर स्थित है और इसे नारायण सरोवर के नाम से ही जाना जाता है। बारह महीने चौबीसो घण्टों यहां दुनियाभर से श्रद्धालु स्नान के लिए आते है। उनके लिए निरन्तर लंगर भी यहां चलता है एवं श्रद्धालुओं के लिए ठहरने की भी यहां व्यवस्था है। वहीं विश्राम कर प्रातः सरोवर में स्नान के बाद यात्र अगले पड़ाव की ओर बढ़ चली। यहां से थोड़ी आगे बढ़ने पर ही भगवान कोटेश्वर का मन्दिर आ जाता है। यानिकी गुजरात के नक्शे में एक छोर पर जैसे लखपत है वैसे ही दूसरे किनारे पर कोटेश्वर भी स्थित है। कोटेश्वर कोई शहर या बस्ती नहीं है बल्कि यह भगवान शिवजी का ही एक रूप है जोकि कोटेश्वर कहलाता है।

माण्डवी भी एक बंदरगाह ही है, लेकिन यह एक बड़ा शहर भी है। यहीं बंदरगाह पर इंटरनेशनल पतंग फैस्टिवल भी आयोजित किया जाता है। पतंग फैस्टिवल में भाग लेने के लिए विश्वभर से यहां सैलानी आते हैं। माण्डवी बीच पर सदैव रोनक रहती है। काईट फैस्टिवल के साथ-साथ माण्डवी शिप मरम्मत के लिए भी जाना जाता है एवं यहां नए शिप भी तैयार किए जाते हैं। यहां केे केबल टीवी ऑपरेटर नवीन जोशी के साथ भी डिजिटलाइजेशन पर चर्चा हुई।

कहते हैं कि रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव जी को भी रावण ने जीत लिया तब भगवान को श्रीलंका ले जाने की जिद रावण ने की। रावण की तपस्या से प्रसन्न शिवजी ने हिमालय से रावण की लंका में जाने की सहमति दे दी, लेकिन साथ में एक शर्त भी लगा दी कि साथ में जाने के लिए तो मैं तैयार हूं, लेकिन मुझे एक बार कहीं रख दोगे तब वहां से उठा नहीं सकोगे। शर्त स्वीकार कर रावण भगवान शिवजी को साथ लिए-लिए इसी मार्ग से अपनी लंका जा रहा था। सारा देवलोक परेशान-व्याकुल हो रहा था कि शिवजी अगर लंका चले गए तब उन्हें वहां से वापिस पाना कठिन हो जाएगा, क्योंकि रावण बहुत तपस्वी ब्राह्यण है, अतः देवों ने अपनी शक्ति से वहां भगवान शिवजी को रोकने के लिए रावण के सम्मुख एक जाल बुना।

वहां एक गाय दलदल में फंसी तड़प रही है और एक बूढ़ा सा कमजोर आदमी गाय को दलदल से बाहर निकालने की नाकाम कोशिश कर रहा है उन्होंने वहां से गुजर रहे रावण से मदद की गुहार लगाई। तब रावण को भी दलदल में फंसी गाय को बचाने में धर्म प्रतीत हुआ और उसने वहीं शिवजी को एक किनार रखकर दलदल में से गाय को निकालने लगा। शर्त के अनुसार भगवान शिवजी वहीं स्थित हो गए, रावण हार गया। भगवान कोटेश्वर के दर्शन कर यात्र आगे बढ़ते हुए माण्डवी पहुंची। माण्डवी भी एक बंदरगाह ही है, लेकिन यह एक बड़ा शहर भी है। यहीं बंदरगाह पर इंटरनेशनल पतंग फैस्टिवल भी आयोजित किया जाता है। पतंग फैस्टिवल में भाग लेने के लिए विश्वभर से यहां सैलानी आते हैं। माण्डवी बीच पर सदैव रोनक रहती है। आज गणेश विसर्जन के लिए भी काफी भीड़ यहां उमड़ी हुई है।

माण्डवी से आगे बढ़ते हुए यात्र अंजार पहुंची जहां गांधी धाम और अंजार के ऑपरेटरों की मीटिंग लेकर बिना रूके सीधे जामनगर पहुंची यात्र। जामनगर पहुंचते-पहुंचते काफी रात हो चुकी थी लेकिन वहां होटल ‘आराम’ में ठहरने के लिए बुकिंग की हुई थी, इसलिए परेशानी नहीं हुई, लेकिन यह होटल भी अपने आप में इतिहास था। माण्डवी जैन तीर्थ स्थान भी है, वहां विजय विलास एवं मोदी का स्पेशल बीच भी है। जामनगर के राजा का एक नायाब स्थान हुआ करता था यह होटल जिसे अब आराम के नाम से जाना जाता है। इसकी भव्यता स्वयं बयान करती है कि यह किसी रजवाड़े से जुड़ी हुई कोई प्राचीन इमारत है, बहरहाल! ओरिजनल्टी को नहीं छेड़ा गया है इस बिल्डिंग की, भले ही जामनगर के एक शानदार होटलों में इसकी गिनती हो लेकिन यह एक हैरिटेज बिल्डिंग भी है। सुबह जामनगर के प्रमुख ऑपरेटरों के साथ ‘गो ग्रीन-गो डिजिटल’ पर चर्चा हुई, मनसुख भाई ने बड़ी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया एवं उनका नया बनाया कन्ट्रोल रूम-ऑफिस सभी विजिट किया। वह शीघ्र ही डिजिटल में जाएंगे। जामनगर से मीटिंग निबटाकर सीधे द्वारिका के लिए रवाना हुई यात्र।

कच्छ से जामनगर तक जीटीपीएल के प्रतिनिधि शैलेश हमारे सहयोगी बने हुए थे, अब उन्हें भी द्वारिका के मार्ग पर थी। कच्छ की एक और विशेषता यह भी देखी कि अधिकांश लोग दोपहर 12 बजे से शाम 4-5 बजे तक आराम पसंद हैं, द्वारिका थोड़ा समय से पूर्व पहुंच गई यात्र। अभी मन्दिर के कपाट खुलने में दो घण्टे बाकी थे अतः हमें जानकारी मिली कि यहां से 60-70 किलोमीटर दूरी पर ओखा पोर्ट के साथ ही वैड द्वारिका जी का मन्दिर समुन्द्र में स्थापित हैं वहां के दर्शन भी जरूरी होते हैं तब आकर द्वारिका जी के दर्शन करने चाहिए तब हमने सीधे ओखा पोर्ट की ओर बढ़ाई यात्र। वैड द्वारिकाधीश दर्शनों के लिए एक बोट में हम भी सवार हो गए। मात्र दस रूपए प्रति सवारी एक तरफ के बोट वाले ने लिए, लेकिन तकरीबन 150 सवारियां उस बोट में ठंसी गई। वहां इसी तरह से ही सवारियां ठंसी जाती हैं, हादसा कभी भी हो सकता है, लेकिन सवारियां स्वयं को उस खतरनाक सफर के सुपुर्द कर देती हैं।

हमने थोड़ा ठहर कर दूसरी फिर तीसरी बोट की प्रतीक्षा भी की लेकिन जब तक पूरी तरह से ठुंस ना जांए सवारी बोट आगे बढ़ती ही नहीं है। वैड द्वारिका जी के दर्शन कर फिर उन्हीं बोट्स में से किसी भी एक में आना मजबूरी थी जैसेे गए वैसे ही वापसी में भी सब सवारियां पूरी तरह से ठुंसी हुई थीं एक बोट में। वापसी में सूर्यास्त बोट में ही हो गया था अतः वहां से द्वारिकाधीश जी पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह से अन्धेरा हो गया था। द्वारिकाधीश जी की आरती चल रही थी अतः दर्शनों में और समय लगा। दर्शन कर प्रसाद लेकर सीधे दीव के लिए बढ़ चली यात्र, क्योंकि दीव में ही एक होटल में ठहरने की व्यवस्था की हुई थी एवं प्रातः 10 बजे गो ग्रीन के अन्तर्गत दीव के एक स्कूल में कार्यक्रम भी रखा हुआ था। द्वारिका से चलते-चलते काफी रात हो चुकी थी अतः रास्ते में पोरबंदर, नवीबंदर, चोरवाड, वीरावल व सोमनाथ मंदिर भी आए परन्तु बिना कहीं रूके सीधे दीव रात्रि 3 बजे पहुंच सके। दीव में प्रसिद्ध होटल आज्जारो में विश्राम किया।

अगली सुबह सवेरे ही तैयार होकर गर्वन्मैंट गर्ल्स हाई स्कूल दीव में आयोजित गो ग्रीन कार्यक्रम के अन्तर्गत पृथ्वी के बढ़ते तापमान के प्रति ग्लोबल वार्मिंग पर छात्रओं को जागरूक करने का प्रयास किया। स्कूल कार्यक्रम के बाद ऐतिहासिक दीव भ्रमण के बाद यात्र एशियाई शेरों के ठिकाने गिर वन की ओर बढ़ चली। दीव दमन को पुर्तगालियों के कब्जे से 1961 में मुक्त करवाया गया था,इसमें भारतीय सेना के अनेक जवान शहीद हुए थे उनके शहीदी स्मारक पर पहुंच कर शहीदों का श्रद्धांजलि देकर यात्र गिर की ओर बढ़ी, लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पुर्तगालियों के कब्जे से दीव को मुक्त करवा लेने के बावजूद भी पुर्तगालियों का वहां की तमाम जगह-मकानों पर कब्जा है। ऐसे अनेक मकान हैं वहां जहां पर पुर्तगालियों के अभी भी ताले लटके हुए है। वह रहते स्काटलैंड में हैं लेकिन उन्होंने अपने कब्जे अभी भी कायम किए हुए है। यहीं एक ओर विचित्रता भी देखने को मिली कि ऐसे अनेक नागरिक यहां है जिनके पास पुर्तगाली पासपोर्ट भी बना हुआ है। यहां ड्यूल नागरिकता वाले भी काफी संख्या में हैं, अतः दीव भले ही पुर्तगालियों से मुक्त करवा लिया गया हो लेकिन वहां भारतीयों की मानसिक गुलामी के प्रमाण अभी भी मौजूद है।

गिर में वन्यविभाग वालों की कोई विशेष बैठक शुरू होने वाली है कल से, इसलिए वहां फाटेस्ट रैस्ट हाऊस में बुकिंग नहीं मिल सकी है अतः वहां एक नवनिर्मित सुख सागर रिर्सोट में विश्राम कर आगे बढ़ी यात्र। इस बार गिर में शेरों से मिलना नहीं हुआ, लेेकिन वहां के केबल टीवी ऑपरेटरों के साथ गो डिजिटल पर चर्चा के बाद यात्र जूनागढ़-राजकोट होते हुए अहमदाबाद पहुंची। जूनागढ़ में भी कच्छ की ही भांति दोपहर में आराम करने की आदत के कारण किसी से भेंट नहीं हो पाई जबकि राजकोट के ऑपरेटरों के साथ डिजिटल पर चर्चा हुई। रात्रि विश्राम के बाद अहमदाबाद में ऑपरेटरों के साथ मीटिंग चलते-चलते शाम हो गई, क्योंकि वहां गणेश विसर्जन का उत्सव बड़ी धूमधाम से गाने-बाजों के साथ मनाया जा रहा था, लम्बे जाम लगे हुए थे, लोग हर्षोल्लास-उमंग में गुलाल-अबीर के साथ नाचते-गाते सड़कों पर गणेश जी का विसर्जन करने निकले हुए थे। जीटीपीएल में ऑपरेटरों के साथ हुई बैठक के बाद गणेश विसर्जन के जाम से पार होते-होते शाम हो गई थी, लेकिन यात्र बिना रूके अहमदाबाद से आगे बढ़ चली।

आगे बढ़ते हुए डाकोर पहुंची यात्र। यहां भी गणेश विसर्जन के साथ-साथ पूनम की रात होने के कारण कृष्ण जी के मन्दिर डाकोर में दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का सड़कों पर हुजूम उमड़ा हुआ था। भारी संख्या में भक्तगणों का डाकोर मन्दिर में दर्शन के लिए तांता लगा हुआ था, रात्रि विश्राम डाकोर में ही करने का निर्णय लिया और डाकोर की मीहमा को टटोलने की कोशिश की गई। जानकारी मिली की यह नगर पूर्व में डंकपुर के नाम से जाना जाता था, यहां का एक व्यक्ति विजय सिंह राजपूत भगवान श्री कृष्ण जी का बहुत बड़ा भक्त था, वह बार-बार यहां से श्री द्वारिकाधीश जी के दशर्नाे को जाता रहता था, आखिरकार उम्र के साथ वह भक्त भोड़ाना के रूप में प्रसिद्ध हो गया था, वह काफी जीर्ण भी हो गया था, लेकिन द्वारिका दर्शन के लिए भी वह जा पाने में असमर्थ हो गया था, तब भगवान श्री कृष्ण से द्वारिका जी मन्दिर में उनके परम भक्त भोड़ाना ने बड़ी विनती सहित प्रार्थना की कि हे कृष्ण अब आगे मैं नहीं आ सकूंगा, मैं नहीं जानता कि आगे आपके दर्शन कैसे कर पाऊंगा! भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण जी ने कहां कि अगली बार पैदल नहीं बैलगाड़ी लेकर आना, मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।

भक्त भोड़ाना की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वह बैलगाड़ी ले सके, लेकिन भगवान के दिए गए निर्देश का पालन करते हुए उसने किसी तरह दो बैलों सहित बैलगाड़ी का प्रबंध किया। बैलों की जीर्ण हालत ऐसी नहीं थी कि वह दो-चार कोस भी चल सके, लेकिन चलते-चलते वह द्वारिका जी पहुंच गया। द्वारिका जी से भगवान श्री कृष्ण स्वयं भक्त भोड़ाना की बैलगाड़ी के सारथी बने रात-रात में ही डंकपुर पहुंच गए। द्वारिका जी से चलकर भगवान श्री कृष्ण सीधे त्रिमलर गांव में रूके एवं वहीं खड़े एक नीम के पेड़ से दातुन तोड़ कर उन्होंने दातुन भी की, इसलिए उस नीम के पेड़ का एक भाग पूरी तरह से कड़वी पत्तियों वाला है तो दूसरी ओर की पत्तियां बिल्कुल कड़वी नहीं होती है।

डंकपुर का नाम बाद में डाकोर पड़ा और भक्त भड़ोना के भगवान श्री कृष्ण के मन्दिर का निर्माण वहां के राजा ने करवाया। कहा जाता है कि उस मन्दिर के निर्माण में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने भी श्रम दान किया, क्योंकि दिन में काम करने वाले कामगारों की संख्या मानो 50 होती थी लेकिन जब उन्हें पारिश्रमिक दिया जाता था तब वह संख्या 49 ही रह जाती थी। भगवान कृष्ण जी द्वारिका से रात्रि में यहां आए थे इसलिए उनकी काली मूर्ति यहां स्थापित है। उनके भक्त देश-दुनिया से यहां दर्शनों के लिए आते है आज पूनम की रात है अतः भक्तों की भीड़ भी बहुत बढ़ गई है।अहमदाबाद से डाकोरगोधरा होते हुए दाहोद पहुंची यात्र। गोधरा के ऑपरेटर गणेश विसर्जन में व्यस्त थे लेकिन दाहेाद के ऑपरेटरों के साथ डिजिटल पर लम्बी चर्चा हुई। उनके स्वागत सत्कार के बाद यात्र गुजरात से मध्य प्रदेश के लिए बढ़ चली।

दाहोद ही गुजरात की अन्तिम बस्ती है मध्य प्रदेश सीमा में प्रवेश से पूर्व। मध्य प्रदेश का यह क्षेत्र आदिवासियों की बहुतायत वाला क्षेत्र है। प्रथम बस्ती झाबुआ आई मध्य प्रदेश की। झाबुआ का ऑपरेटर प्रदीप कहीं बाहर गया हुआ है, लेकिन यहां के प्रसिद्ध मुर्गो की विशेष प्रजाति कड़कनाथ रास्ते में मिले, जिनके फोटो भी लिए। विशिष्ट प्रजाति का यह मुर्गा यहीं झाबुआ में होते है। झाबुआ में अब बाकायदा इन मुर्गो के भी फार्म हाऊस बन गए हैं। दाहोद स्वागत सत्कार के बाद वहां से सीधे इंदौर पहुंची यात्र। इंदौर में शाकिर-टीट्र भाई के साथ बंगलौर अट्राई का इंदौर एसआर केबल का निरीक्षण किया जो कि वाकई पूर्णतया प्रोफेशनल दिखाई दिया। हालांकि यहां फिर से ऑपरेटरों के कम्प्टीशन होने के आसार प्रबल हो रहे है, लेकिन प्रोफेशनल बनने में बाकी को अभी काफी समय लग सकता है। इन्दौर तक पहुंचते-पहुंचते पूरा सितम्बर खत्म हो गया है।

यहीं से अब अक्टूबर की शुरूआत होगी। दिल्ली से आरम्भ हुई इस यात्र ने अब तक कुल 10 राज्य(ैजंजम) एवं 2 केंद्रशासित राज्य(न्ण्ज्) कवर कर लिया है। केबल टीवी इण्डस्ट्री में भी इन्दौर की अपनी अलग कहानी है, अभी भी कुल 5 हैडेण्ड वहां हैं। इन्दौर से आगे बढ़ते हुए यात्र खण्डवा होते हुए बुरहानपुर पहुंची, वहां रमेश पातोदार नए ऑपरेटर से भेंट हुई जो बड़ी दंबगता के साथ नेटवर्क भी ऑपरेट कर रहे हैं जबकि उनके अन्य व्यवसाय भी हैं। मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमा पर स्थित है बुरहानपुर, यहीं से महाराष्ट्र में प्रवेश किया यात्र ने। मार्ग में ओमकारेश्वर तीर्थ स्थान भी आया, वहां पहुंच दर्शन कर यात्र जलगांव होते हुए भुसावल पहुंची। भुसावल में ही रात्रि विश्राम एवं ऑपरेटरों के साथ मीटिंग कर यात्र सीधे अहमदनगर के लिए बढ़ चली। सारे रास्ते में तुफानी बारिस आज भी जारी रही, जबकि कल भी इसी तरह से बिजली कड़कती रही और बादल गरजते रहे थे। अहमदनगर में ऑपरेटरों के साथ मीटिंग कर यात्र एक नए मार्ग से कल्याण-पनवेल-थाने की ओर रवाना हो गई।

कल्याण तक मार्ग प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब हो रहा था, बहुत ही खूबसूरत यह मार्ग मुम्बई के लिए बनाया गया है। कल्याण में गनपत गायकवाड़ से भेंट हुई जो कि केबल टीवी ऑपरेटर के साथ-साथ वहां के माननीय विधायक भी हं। माननीय इसलिए कि वह अपने व्यवहार के कारण ही आजाद उम्मीदवार के रूप में वहां के विधायक चुने गए जबकि उनके सामने खड़े भिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों की जमानतें भी जब्त हो गई। केबल टीवी में भी उनकी उपस्थिति उसी तरह से सम्मानजनक है। वह आरम्भ से अभी तक भी नाना प्रकार से समाज में जरूरत मंदो की मदद करते रहते है। एक भले इंसान हैं गनपत गायकवाड़। उनसे मिल लेने के बाद लम्बी यात्र की काफी थकान दूर हो गई। कल्याण से पनवेल के मार्ग से थाने होकर सीधे मुम्बई पहुंची यात्र। मुम्बई का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है, अतः यात्र का यह भाग यहीं बंद कर अगले भाग को मुम्बई से ही खोलेंगे।

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